भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 482

‘इस जगत्में जितनी भी शिल्पकलाएँ हैं तथा दूसरे भी जो अत्यन्त कठिन कार्य हैं, मैं उन सबको अच्छी तरह करनेका प्रयत्न कर सकता हूँ। महाराज ऋतुपर्ण! आप मेरा भरण-पोषण कीजिये’ ।। ४ ।।

ऋतुपर्ण उवाच

वस बाहुक भद्रं ते सर्वमेतत् करिष्यसि । शीघ्रयाने सदा बुद्धिर्ध्रियते मे विशेषतः ।। ५ ।। **ऋतुपर्णने कहा—**बाहुक! तुम्हारा भला हो। तुम मेरे यहाँ निवास करो। ये सब कार्य तुम्हें करने होंगे। मेरे मनमें सदा यही विचार विशेषतः रहता है कि मैं शीघ्रतापूर्वक कहीं भी पहुँच सकूँ ।। ५ ।। स त्वमातिष्ठ योगं तं येन शीघ्रा हया मम । भवेयुरश्वाध्यक्षोऽसि वेतनं ते शतं शतम् ।। ६ ।। अतः तुम ऐसा उपाय करो, जिससे मेरे घोड़े शीघ्रगामी हो जायँ। आजसे तुम हमारे अश्वाध्यक्ष हो। दस हजार मुद्राएँ तुम्हारा वार्षिक वेतन है ।। ६ ।। त्वामुपस्थास्यतश्चैव नित्यं वार्ष्णेयजीवलौ । एताभ्यां रंस्यसे सार्धं वस वै मयि बाहुक ।। ७ ।।