महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 484, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिशाकाले स्मरंस्तस्याः श्लोकमेकं स्म गायति । स विभ्रमन् महीं सर्वां क्वचिदासाद्य किंचन ।। १५ ।। वसन्यनर्हस्तद् दुःखं भूय एवानुसंस्मरन् । 'रातमें उसीका स्मरण करके वह एक श्लोकको गाया करता है। सारी पृथ्वीका चक्कर लगाकर वह कभी किसी स्थानमें पहुँचा और वहीं निरन्तर उस प्रियतमाका स्मरण करके दुःख भोगता रहता है। यद्यपि वह उस दुःखको भोगनेके योग्य है नहीं ।। १५ १/२ ।। सा तु तं पुरुषं नारी कृच्छ्रेऽप्यनुगता वने ।। १६ ।। त्यक्ता तेनाल्पपुण्येन दुष्करं यदि जीवति । एका बालानभिज्ञा च मार्गाणामतथोचिता ।। १७ ।। 'वह नारी इतनी पतिव्रता थी कि संकटकालमें भी उस पुरुषके पीछे-पीछे वनमें चली गयी; किंतु उस अल्प पुण्यवाले पुरुषने उसे वनमें ही त्याग दिया। अब तो यदि वह जीवित होगी तो बड़े कष्टसे उसके दिन बीतते होंगे। वह स्त्री अकेली थी। उसे मार्गका ज्ञान नहीं था। जिस संकटमें वह पड़ी थी, उसके योग्य वह कदापि नहीं थी ।। १६-१७ ।। क्षुत्पिपासापरीताङ्गी दुष्करं यदि जीवति । श्वापदाचरिते नित्यं वने महति दारुणे ।। १८ ।। त्यक्ता तेनाल्पभाग्येन मन्दप्रज्ञेन मारिष । इत्येवं नैषधो राजा दमयन्तीमनुस्मरन् ।। अज्ञातवासं न्यवसद् राज्ञस्तस्य निवेशने ।। १९ ।। 'भूख और प्याससे उसके अंग व्याप्त हो रहे थे। उस दशामें परित्यक्त होकर वह यदि जीवित भी हो तो भी उसका जीवित रहना बहुत कठिन है। आर्य जीवल! अत्यन्त भयंकर विशाल वनमें जहाँ नित्य-निरन्तर हिंसक जन्तु विचरते रहते हैं, उस मन्दबुद्धि एवं मन्दभाग्य पुरुषने उसका त्याग कर दिया था।' इस प्रकार निषधनरेश राजा नल दमयन्तीका निरन्तर स्मरण करते हुए राजा ऋतुपर्णके यहाँ अज्ञातवास कर रहे थे ।। १८-१९ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलविलापे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ।। ६७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलविलापविषयक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६७ ।।