महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 495, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘तुम्हारी माँका ब्याह राजा भीमके साथ हुआ और मेरा चेदिराज वीरबाहुके साथ। तुम्हारा जन्म दशार्णदिशमें मेरे पिताके ही घरपर हुआ और मैंने अपनी आँखों देखा ।। १५ ।। यथैव ते पितुर्गेहं तथैव मम भामिनि । यथैव च ममैश्वर्यं दमयन्ति तथा तव ।। १६ ।। ‘भामिनि! तुम्हारे लिये जैसा पिताका घर है, वैसा ही मेरा घर है। दमयन्ती! यह सारा ऐश्वर्य जैसे मेरा है, उसी प्रकार तुम्हारा भी है’ ।। १६ ।। तां प्रहृष्टेन मनसा दमयन्ती विशाम्पते । प्रणम्य मातृभगिनीमिदं वचनमब्रवीत् ।। १७ ।। युधिष्ठिर! तब दमयन्तीने प्रसन्न हृदयसे अपनी मौसीको प्रणाम करके कहा — ।। १७ ।। अज्ञायमानापि सती सुखमस्म्युषिता त्वयि । सर्वकामैः सुविहिता रक्ष्यमाणा सदा त्वया ।। १८ ।। ‘माँ! यद्यपि तुम मुझे पहचानती नहीं थी, तब भी मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रही हूँ। तुमने मेरी इच्छानुसार सारी सुविधाएँ कर दीं और सदा तुम्हारे द्वारा मेरी रक्षा होती रही ।। १८ ।। सुखात् सुखतरो वासो भविष्यति न संशयः । चिरविप्रोषितां मातर्मामनुज्ञातुमर्हसि ।। १९ ।। ‘अब यदि मैं यहाँ रहूँ तो यह मेरे लिये अधिक-से-अधिक सुखदायक होगा, इसमें संशय नहीं है, किंतु मैं बहुत दिनोंसे प्रवासमें भटक रही हूँ, अतः माताजी! मुझे विदर्भ जानेकी आज्ञा दीजिये ।। १९ ।। दारकौ च हि मे नीतौ वसतस्तत्र बालकौ । पित्रा विहीनौ शोकार्तौ मया चैव कथं नु तौ ।। २० ।। ‘मैंने अपने बच्चोंको पहले ही कुण्डिनपुर भेज दिया था। वे वहीं रहते हैं। पितासे तो उनका वियोग हो ही गया है; मुझसे भी वे बिछुड़ गये हैं, ऐसी दशामें वे शोकार्त बालक कैसे रहते होंगे? ।। २० ।। यदि चापि प्रियं किंचिन्मयि कर्तुमिहेच्छसि । विदर्भान् यातुमिच्छामि शीघ्रं मे यानमादिश ।। २१ ।। बाढमित्येव तामुक्त्वा हृष्टा मातृष्वसा नृप । गुप्तां बलेन महता पुत्रस्यानुमते ततः ।। २२ ।। प्रास्थापयद् राजमाता श्रीमतीं नरवाहिना । यानेन भरतश्रेष्ठ स्वन्नपानपरिच्छदाम् ।। २३ ।।