महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 497, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाष्पेणापिहिता राज्ञी नोत्तरं किंचिदब्रवीत् ॥ ३० ॥ दमयन्तीके ऐसा कहनेपर महारानीकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं। वे अत्यन्त दुःखी हो गयीं और तत्काल उसे कोई उत्तर न दे सकीं ॥ ३० ॥ तदवस्थां तु तां दृष्ट्वा सर्वमन्तःपुरं तदा । हाहाभूतमतीवासीद् भृशं च प्ररुरोद ह ॥ ३१ ॥ तब महारानीकी यह दयनीय अवस्था देख उस समय सारे अन्तःपुरमें हाहाकार मच गया। सब-के-सब फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ३१ ॥ ततो भीमं महाराजं भार्या वचनमब्रवीत् । दमयन्ती तव सुता भर्तारमनुशोचति ॥ ३२ ॥ तदनन्तर महाराज भीमसे उनकी पत्नीने कहा—'प्राणनाथ! आपकी पुत्री दमयन्ती अपने पतिके लिये निरन्तर शोकमें डूबी रहती है ॥ ३२ ॥ अपकृष्य च लज्जां सा स्वयमुक्तवती नृप । प्रयतन्तां तव प्रेष्याः पुण्यश्लोकस्य मार्गणे ॥ ३३ ॥ 'नरेश्वर! उसने लाज छोड़कर स्वयं अपने मुँहसे कहा है, अतः आपके सेवक पुण्यश्लोक महाराज नलका पता लगानेका प्रयत्न करें' ॥ ३३ ॥ तया प्रदेशितो राजा ब्राह्मणान् वशवर्तिनः । प्रास्थापयद् दिशः सर्वा यतध्वं नलमार्गणे ॥ ३४ ॥ महारानीसे प्रेरित हो राजा भीमने अपने अधीनस्थ ब्राह्मणोंको यह कहकर सब दिशाओंमें भेजा कि 'आपलोग नलको ढूँढ़नेकी चेष्टा करें' ॥ ३४ ॥ ततो विदर्भाधिपतेर्नियोगाद् ब्राह्मणास्तदा । दमयन्तीमथो सृत्वा प्रस्थिताःसमेत्याथाब्रुवन् ॥ ३५ ॥ तत्पश्चात् विदर्भनरेशकी आज्ञासे ब्राह्मणलोग प्रस्थित हो दमयन्तीके पास जाकर बोले—'राजकुमारी! हम सब नलका पता लगाने जा रहे हैं (क्या आपको कुछ कहना है?)' ॥ ३५ ॥