महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 499, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमन्यच्च वक्तव्यं कृपां कुर्याद् यथा मयि । वायुना धूयमानो हि वनं दहति पावकः ॥ ४० ॥ ‘ब्राह्मणो! ये तथा और भी बहुत-सी ऐसी बातें आप कहें, जिससे वे मुझपर कृपा करें। वायुकी सहायतासे प्रज्वलित आग सारे वनको जला डालती है (इसी प्रकार विरहकी व्याकुलता मुझे जला रही है) ॥ ४० ॥ भर्तव्या रक्षणीया च पत्नी पत्या हि सर्वदा । तन्नष्टमुभयं कस्माद् धर्मज्ञस्य सतस्तव ॥ ४१ ॥ ‘प्राणनाथ! पतिको उचित है कि वह सदा अपनी पत्नीका भरण-पोषण एवं संरक्षण करे। आप धर्मज्ञ और साधु पुरुष हैं, आपके ये दोनों कर्तव्य सहसा नष्ट कैसे हो गये? ॥ ४१ ॥ ख्यातः प्राज्ञः कुलीनश्च सानुक्रोशो भवान् सदा । संवृत्तो निरनुक्रोशः शङ्के मद्भाग्यसंक्षयात् ॥ ४२ ॥ ‘आप विख्यात विद्वान्, कुलीन और सदा सबके प्रति दयाभाव रखनेवाले हैं, परंतु मेरे हृदयमें यह संदेह होने लगा है कि आप मेरा भाग्य नष्ट होनेके कारण मेरे प्रति निर्दय हो गये हैं ॥ ४२ ॥ तत् कुरुष्व नरव्याघ्र दयां मयि नरर्षभ । आनृशंस्यं परो धर्मस्त्वत्त एव हि मे श्रुतः ॥ ४३ ॥ ‘नरव्याघ्र! नरोत्तम! मुझपर दया करो। मैंने तुम्हारे ही मुखसे सुन रखा है कि दयालुता सबसे बड़ा धर्म है’ ॥ ४३ ॥ एवं ब्रुवाणान् यदि वः प्रतिब्रूयात् कथंचन । स नरः सर्वथा ज्ञेयः कश्चासौ क्व नु वर्तते ॥ ४४ ॥ ‘ब्राह्मणो! यदि आपके ऐसी बातें कहनेपर कोई किसी प्रकार भी आपको उत्तर दे तो उस मनुष्यका सब प्रकारसे परिचय प्राप्त कीजियेगा कि वह कौन है और कहाँ रहता है, इत्यादि ॥ ४४ ॥ यश्चैवं वचनं श्रुत्वा ब्रूयात् प्रतिवचो नरः । तदादाय वचस्तस्य ममावेद्यं द्विजोत्तमाः ॥ ४५ ॥ ‘विप्रवरो! आपके इन वचनोंको सुनकर जो कोई मनुष्य जैसा भी उत्तर दे, उसकी वह बात याद रखकर आपलोग मुझे बतावें ॥ ४५ ॥ यथा च वो न जानीयाद् ब्रुवतो मम शासनात् । पुनरागमनं चैव तथा कार्यमतन्द्रितैः ॥ ४६ ॥ ‘किसीको भी यह नहीं मालूम होना चाहिये कि आपलोग मेरी आज्ञासे ये बातें कह रहे हैं। जब कोई उत्तर मिल जाय, तब आप आलस्य छोड़कर पुनः यहाँ तुरंत लौट आवें ॥ ४६ ॥