महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 506, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकसप्ततितमोऽध्यायः
राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्भुत अश्वसंचालन-कलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना
बृहदश्व उवाच
श्रुत्वा वचः सुदेवस्य ऋतुपर्णो नराधिपः ।
सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा बाहुकं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! सुदेवकी वह बात सुनकर राजा ऋतुपर्णने मधुर वाणीसे सान्त्वना देते हुए बाहुकसे कहा— ॥ १ ॥
विदर्भान् यातुमिच्छामि दमयन्त्याः स्वयंवरम् ।
एकाह्ना हयतत्त्वज्ञ मन्यसे यदि बाहुक ॥ २ ॥
'बाहुक! तुम अश्वविद्याके तत्त्वज्ञ हो, यदि मेरी बात मानो तो मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें सम्मिलित होनेके लिये एक ही दिनमें विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ' ॥ २ ॥
एवमुक्तस्य कौन्तेय तेन राज्ञा नलस्य ह ।
व्यदीर्यत मनो दुःखात् प्रदध्यौ च महामनाः ॥ ३ ॥
कुन्तीनन्दन! राजा ऋतुपर्णके ऐसा कहनेपर राजा नलका मन अत्यन्त दुःखसे विदीर्ण होने लगा। महामना नल बहुत देरतक किसी भारी चिन्तामें निमग्न हो गये ॥ ३ ॥
दमयन्ती वदेदेतत् कुर्याद् दुःखेन मोहिता ।
अस्मदर्थे भवेद् वायमुपायश्चिन्तितो महान् ॥ ४ ॥
वे सोचने लगे—'क्या दमयन्ती ऐसी बात कह सकती है? अथवा सम्भव है, दुःखसे मोहित होकर वह ऐसा कार्य कर ले। कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसने मेरी प्राप्तिके लिये यह महान् उपाय सोच निकाला हो? ॥ ४ ॥
नृशंसं बत वैदर्भी भर्तुकामा तपस्विनी ।
मया क्षुद्रेण निकृता कृपणा पापबुद्धिना ॥ ५ ॥
स्त्रीस्वभावश्चलो लोके मम दोषश्च दारुणः ।
स्यादेवमपि कुर्यात् सा विवासाद् गतसौहृदा ॥ ६ ॥
'तपस्विनी एवं दीन विदर्भराजकुमारीको मुझ नीच एवं पापबुद्धि पुरुषने धोखा दिया है, इसीलिये वह ऐसा निष्ठुर कार्य करनेको उद्यत हो गयी। संसारमें स्त्रीका चंचल स्वभाव