महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजुते हुए रथपर राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ सवार हुए। इसलिये उनके चढ़ते ही वे उत्तम घोड़े घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २० ॥ ततो नरवरः श्रीमान् नलो राजा विशाम्पते । सान्त्वयामास तानश्वांस्तेजोबलसमन्वितान् ॥ २१ ॥ युधिष्ठिर! तब नरश्रेष्ठ श्रीमान् राजा नलने तेज और बलसे सम्पन्न उन घोड़ोंको पुचकारा ॥ २१ ॥ रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमियेष सः । सूतमारोप्य वार्ष्णेयं जवमास्थाय वै परम् ॥ २२ ॥ ते चोद्यमाना विधिवद् बाहुकेन हयोत्तमाः । समुत्पेतुरथाकाशं रथिनं मोहयन्निव ॥ २३ ॥ फिर अपने हाथमें बागडोर ले उन्हें काबूमें करके रथको आगे बढ़ानेकी इच्छा की। वार्ष्णेय सारथिको रथपर बैठाकर अत्यन्त वेगका आश्रय ले उन्होंने रथ हाँक दिया। बाहुकके द्वारा विधिपूर्वक हाँके जाते हुए वे उत्तम अश्व रथीको मोहित—से करते हुए इतने तीव्र वेगसे चले, मानो आकाशमें उड़ रहे हों ॥ २२-२३ ॥
तथा तु दृष्ट्वा तानश्वान् वहतो वातरंहसः ।