भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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अपनी किरणोंसे पृथ्वीका रस (जल) खींचा और दक्षिणायनमें लौटकर पृथ्वीको उस रससे आविष्ट किया ।। ५-६ ।।

क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः । दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा ।। ७ ।। इस प्रकार जब सारे भूमण्डलमें क्षेत्र तैयार हो गया, तब ओषधियोंके स्वामी चन्द्रमाने अन्तरिक्षमें मेघोंके रूपमें परिणत हुए सूर्यके तेजको प्रकट करके उसके द्वारा बरसाये हुए जलसे अन्न आदि ओषधियोंको उत्पन्न किया ।। ७ ।।

निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः । ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि ।। ८ ।। चन्द्रमाकी किरणोंसे अभिषिक्त हुआ सूर्य जब अपनी प्रकृतिमें स्थित हो जाता है, तब छः प्रकारके रसोंसे युक्त पवित्र ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। वही पृथ्वीमें प्राणियोंके लिये अन्न होता है ।। ८ ।।

एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम् । पितैष सर्वभूतानां तस्मात् तं शरणं व्रज ।। ९ ।। इस प्रकार सभी जीवोंके प्राणोंकी रक्षा करनेवाला अन्न सूर्यरूप ही है। अतः भगवान् सूर्य ही समस्त प्राणियोंके पिता हैं, इसलिये तुम उन्हींकी शरणमें जाओ ।। ९ ।।

राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः । उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम् ।। १० ।। जो जन्म और कर्म दोनों ही दृष्टियोंसे परम उज्ज्वल हैं, ऐसे महात्मा राजा भारी तपस्याका आश्रय लेकर सम्पूर्ण प्रजाजनोंका संकटसे उद्धार करते हैं ।। १० ।।

भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च । तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः ।। ११ ।। भीम, कार्तवीर्य अर्जुन, वेनपुत्र पृथु तथा नहुष आदि नरेशोंने तपस्या, योग और समाधिमें स्थित होकर भारी आपत्तियोंसे प्रजाको उबारा है ।। ११ ।।

तथा त्वमपि धर्मात्मन् कर्मणा च विशोधितः । तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन् भर भारत ।। १२ ।। धर्मात्मा भारत! इसी प्रकार तुम भी सत्कर्मसे शुद्ध होकर तपस्याका आश्रय ले धर्मानुसार द्विजातियोंका भरण-पोषण करो ।। १२ ।।

जनमेजय उवाच

कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः । विप्रार्थमाराधितवान् सूर्यमद्भुतदर्शनम् ।। १३ ।।

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