महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 511, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'इसके शरीरकी रूपहीनताको लक्ष्य करके मेरी बुद्धिमें यह भेद नहीं पैदा होता कि यह नल नहीं है, परंतु राजा नलकी जो मोटाई है, उससे यह कुछ दुबला-पतला है। उससे मेरे मनमें यह विचार होता है कि सम्भव है, यह नल न हो ।। ३२ ।। वयःप्रमाणं तत्तुल्यं रूपेण तु विपर्ययः । नलं सर्वगुणैर्युक्तं मन्ये बाहुकमन्ततः ॥ ३३ ॥ 'इसकी अवस्थाका प्रमाण तो उन्हींके समान है, परंतु रूपकी दृष्टिसे तो अन्तर पड़ता है। फिर भी अन्ततः मैं इसी निर्णयपर पहुँचता हूँ कि मेरी रायमें बाहुक सर्वगुणसम्पन्न राजा नल ही हैं' ।। ३३ ।। एवं विचार्य बहुशो वार्ष्णेयः पर्यचिन्तयत् । हृदयेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथिः ॥ ३४ ॥ महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पुण्यश्लोक नलके सारथि वार्ष्णेयने बार-बार उपर्युक्त रूपसे विचार करते हुए मन-ही-मन उक्त धारणा बना ली ।। ३४ ।। ऋतुपर्णश्च राजेन्द्रो बाहुकस्य हयज्ञताम् । चिन्तयन् मुमुदे राजा सहवार्ष्णेयसारथिः ॥ ३५ ॥ महाराज ऋतुपर्ण भी बाहुकके अश्वसंचालन-विषयक ज्ञानपर विचार करके वार्ष्णेय सारथिके साथ बहुत प्रसन्न हुए ।। ३५ ।। ऐकाग्र्यं च तथोत्साहं हयसंग्रहणं च तत् । परं यत्नं च सम्प्रेक्ष्य परां मुदमवाप ह ॥ ३६ ॥ उसकी वह एकाग्रता, वह उत्साह, घोड़ोंको काबूमें रखनेकी वह कला और वह उत्तम प्रयत्न देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ।। ३६ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि ऋतुपर्णविदर्भगमने एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें ऋतुपर्णका विदर्भदेशमें गमनविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।