भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 515

राजाने मानो अनिच्छासे कहा—‘अच्छा, गिन लो। अश्वविद्याके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप बाहुक! मेरे बताये अनुसार तुम शाखाके एक ही भागको गिनो। इससे तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी’। बाहुकने रथसे उतरकर तुरंत ही उस वृक्षको काट डाला ॥ २२-२३ ॥ ततः स विस्मयाविष्टो राजानमिदमब्रवीत् । गणयित्वा यथोक्तानि तावन्त्येव फलानि तु ॥ २४ ॥ गिननेसे उसे उतने ही फल मिले। तब उसने विस्मित होकर राजा ऋतुपर्णसे कहा — ॥ २४ ॥ अत्यद्भुतमिदं राजन् दृष्टवानस्मि ते बलम् । श्रोतुमिच्छामि तां विद्यां ययैतज्ज्ञायते नृप ॥ २५ ॥ तमुवाच ततो राजा त्वरितो गमने नृप । विद्ध्यक्षहृदयज्ञं मां संख्याने च विशारदम् ॥ २६ ॥ ‘राजन्! आपमें गणितकी यह अद्भुत शक्ति मैंने देखी है। नराधिप! जिस विद्यासे यह गिनती जान ली जाती है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।’ राजा तुरंत जानेके लिये उत्सुक थे, अतः उन्होंने बाहुकसे कहा—‘तुम मुझे द्यूत-विद्याका मर्मज्ञ और गणितमें अत्यन्त निपुण समझो’ ॥ २५-२६ ॥ बाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्यामिमां मम । मत्तोऽपि चाश्वहृदयं गृहाण पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥ बाहुकने कहा—‘पुरुषश्रेष्ठ! तुम यह विद्या मुझे बतला दो और बदलेमें मुझसे भी अश्व-विद्याका रहस्य ग्रहण कर लो’ ॥ २७ ॥ ऋतुपर्णस्ततो राजा बाहुकं कार्यगौरवात् । हयज्ञानस्य लोभाच्च तं तथेत्यब्रवीद् वचः ॥ २८ ॥ तब राजा ऋतुपर्णने कार्यकी गुरुता और अश्व-विज्ञानके लोभसे बाहुकको आश्वासन देते हुए कहा—‘तथास्तु’ ॥ २८ ॥ यथोक्तं त्वं गृहाणेदमक्षाणां हृदयं परम् । निक्षेपो मेऽश्वहृदयं त्वयि तिष्ठतु बाहुक । एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णो नलाय वै ॥ २९ ॥ ‘बाहुक! तुम मुझसे द्यूत-विद्याका गूढ़ रहस्य ग्रहण करो और अश्वविज्ञानको मेरे लिये अपने ही पास धरोहरके रूपमें रहने दो।’ ऐसा कहकर ऋतुपर्णने नलको अपनी विद्या दे दी ॥ २९ ॥ तस्याक्षहृदयज्ञस्य शरीरात्रिःसृतः कलिः । कर्कोटकविषं तीक्ष्णं मुखात् सततमुद्वमन् ॥ ३० ॥ कलेस्तस्य तदार्तस्य शापाग्निः स विनिःसृतः । स तेन कर्शितो राजा दीर्घकालमनात्मवान् ॥ ३१ ॥