महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह अद्भुत बात देखकर मैं आश्चर्यचकित होकर यहाँ आयी हूँ। बाहुकमें एक और भी बड़े आश्चर्यकी बात देखी है ।। १४ ।। यदग्निमपि संस्पृश्य नैवासौ दह्यते शुभे । छन्देन चोदकं तस्य वहत्यावर्जितं द्रुतम् ।। १५ ।। शुभे! वह अग्निका स्पर्श करके भी जलता नहीं है। पात्रमें रखा हुआ थोड़ा-सा जल भी उसकी इच्छाके अनुसार तुरंत ही प्रवाहित हो जाता है ।। १५ ।। अतीव चान्यत् सुमहदाश्चर्यं दृष्टवत्यहम् । यत् स पुष्पाण्युपादाय हस्ताभ्यां ममृदे शनैः ।। १६ ।। मृद्यमानानि पाणिभ्यां तेन पुष्पाणि नान्यथा । भूय एव सुगन्धीनि हृषितानि भवन्ति हि । एतान्यद्भुतलिङ्गानि दृष्ट्वाहं द्रुतमागता ।। १७ ।। एक और भी अत्यन्त आश्चर्यजनक बात मुझे उसमें दिखायी दी है। वह फूल लेकर उन्हें हाथोंसे धीरे-धीरे मलता था। हाथोंसे मसलनेपर भी वे फूल विकृत नहीं होते थे अपितु और भी सुगन्धित और विकसित हो जाते थे। ये अद्भुत लक्षण देखकर मैं शीघ्रतापूर्वक यहाँ आयी हूँ ।। १६-१७ ।।
बृहदश्व उवाच दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा पुण्यश्लोकस्य चेष्टितम् । अमन्यत नलं प्राप्तं कर्मचेष्टाभिसूचितम् ।। १८ ।। **बृहदश्व मुनि कहते हैं—**युधिष्ठिर! दमयन्तीने पुण्यश्लोक महाराज नलकी-सी बाहुककी सारी चेष्टाओंको सुनकर मन-ही-मन यह निश्चय कर लिया कि महाराज नल ही आये हैं। अपने कार्यों और चेष्टाओंद्वारा वे पहचान लिये गये हैं ।। १८ ।। सा शङ्कमाना भर्तारं बाहुकं पुनरिङ्गितैः । केशिनीं श्लक्ष्णया वाचा रुदती पुनरब्रवीत् ।। १९ ।। पुनर्गच्छ प्रमत्तस्य बाहुकस्योपसंस्कृतम् । महानसाद् द्रुतं मांसमानयस्वेह भाविनि ।। २० ।। सा गत्वा बाहुकस्याग्रे तन्मांसमपकृष्य च । अत्युष्णमेव त्वरिता तत्क्षणात् प्रियकारिणी ।। २१ ।। चेष्टाओंद्वारा उसके मनमें यह प्रबल आशंका जम गयी कि बाहुक मेरे पति ही हैं। फिर तो वह रोने लगी और मधुर वाणीमें केशिनीसे बोली—‘सखि! एक बार फिर जाओ और जब बाहुक असावधान हो तो उसके द्वारा विशेषविधिसे उबालकर तैयार किया गया फलोंका गूदा रसोई घरमेंसे शीघ्र उठा लाओ।' केशिनी दमयन्तीकी प्रियकारिणी सखी थी।