महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 536, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतकुलभूषण! पिता और माताकी आज्ञा ले दमयन्तीने नलको राजभवनके भीतर जहाँ वह स्वयं रहती थी, बुलवाया। दमयन्तीको सहसा सामने उपस्थित देख राजा नल शोक और दुःखसे व्याप्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ ६-७ ॥ तं तु दृष्ट्वा तथायुक्तं दमयन्ती नलं तदा । तीव्रशोकसमाविष्टा बभूव वरवर्णिनी ॥ ८ ॥ उस समय नलको उस अवस्थामें देखकर सुन्दरी दमयन्ती भी तीव्र शोकसे व्याकुल हो गयी ॥ ८ ॥ ततः काषायवसना जटिला मलपङ्किनी । दमयन्ती महाराज बाहुकं वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥ महाराज! तदनन्तर मलिन वस्त्र पहने, जटा धारण किये, मैल और पंकसे मलिन दमयन्तीने बाहुकसे पूछा— ॥ ९ ॥ पूर्वं दृष्टस्त्वया कश्चिद् धर्मज्ञो नाम बाहुक । सुप्तामुत्सृज्य विपिने गतो यः पुरुषः स्त्रियम् ॥ १० ॥ 'बाहुक! तुमने पहले किसी ऐसे धर्मज्ञ पुरुषको देखा है, जो अपनी सोयी हुई पत्नीको वनमें अकेली छोड़कर चले गये थे ॥ १० ॥ अनागसं प्रियां भार्यां विजने श्रममोहिताम् । अपहाय तु को गच्छेत् पुण्यश्लोकमृते नलम् ॥ ११ ॥ 'पुण्यश्लोक महाराज नलके सिवा दूसरा कौन होगा, जो एकान्तमें थकावटके कारण अचेत सोयी हुई अपनी निर्दोष प्रियतमा पत्नीको छोड़कर जा सकता हो ॥ ११ ॥ किमु तस्य मया बाल्यादपराद्धं महीपतेः । यो मामुत्सृज्य विपिने गतवान् निद्रयार्दिताम् ॥ १२ ॥ 'न जाने उन महाराजका मैंने बचपनसे ही क्या अपराध किया था, जो नींदकी मारी हुई मुझ असहाय अबलाको जंगलमें छोड़कर चल दिये ॥ १२ ॥ साक्षाद् देवानपाहाय वृतो यः स पुरा मया । अनुव्रतां साभिकामां पुत्रिणीं त्यक्तवान् कथम् ॥ १३ ॥ 'पहले स्वयंवरके समय साक्षात् देवताओंको छोड़कर मैंने उनका वरण किया था। मैं उनकी अनुगत भक्त, निरन्तर उन्हें चाहनेवाली और पुत्रवती हूँ, तो भी उन्होंने कैसे मुझे त्याग दिया? ॥ १३ ॥ अग्नौ पाणिं गृहीत्वा तु देवाना मग्रतस्तथा । भविष्यामीति सत्यं तु प्रतिश्रुत्य क्व तद् गतम् ॥ १४ ॥ 'अग्निके समीप और देवताओंके समक्ष मेरा हाथ पकड़कर और 'मैं तेरा ही अनुगत होकर रहूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके जिन्होंने मुझे अपनाया था, उनका वह सत्य कहाँ चला गया?' ॥ १४ ॥