महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 542, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंततोऽब्रवीन्महाराजः कृतशौचमहं नलम् । दमयन्त्या सहोपेतं कल्ये द्रष्टा सुखोषितम् ॥ ४८ ॥ तब महाराज भीमने कहा—'आज नलको सुखपूर्वक यहीं रहने दो। कल सबेरे स्नान आदिसे शुद्ध हुए दमयन्तीसहित नलसे मैं मिलूँगा' ॥ ४८ ॥
ततस्तौ सहितौ रात्रिं कथयन्तौ पुरातनम् । वने विचरितं सर्वमूषतुर्मुदितौ नृप ॥ ४९ ॥ राजन्! तत्पश्चात् वे दोनों दम्पति रातभर वनमें रहनेकी पुरानी घटनाओंको एक-दूसरेसे कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक एक साथ रहे ॥ ४९ ॥
गृहे भीमस्य नृपतेः परस्परसुखैषिणौ । वसेतां हृष्टसंकल्पौ वैदर्भी च नलश्च ह ॥ ५० ॥ एक-दूसरेको सुख देनेकी इच्छा रखनेवाले दमयन्ती और नल राजा भीमके महलमें प्रसन्नचित्त होकर रहे ॥ ५० ॥
स चतुर्थे ततो वर्षे संगम्य सह भार्यया । सर्वकामैः सुसिद्धार्थो लब्धवान् परमां मुदम् ॥ ५१ ॥ चौथे वर्षमें अपनी प्यारी पत्नीसे मिलकर सम्पूर्ण कामनाओंसे सफलमनोरथ हो नल अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गये ॥ ५१ ॥
दमयन्त्यपि भर्तारमासाद्याप्यायिता भृशम् । अर्धसंजातसस्येव तोयं प्राप्य वसुंधरा ॥ ५२ ॥ जैसे आधी जमी हुई खेतीसे भरी वसुधा वर्षाका जल पाकर उल्लसित हो उठती है, उसी प्रकार दमयन्ती भी अपने पतिको पाकर बहुत संतुष्ट हुई ॥ ५२ ॥
सैवं समेत्य व्यपनीय तन्द्रां शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा । रराज भैमी समवाप्तकामा शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ॥ ५३ ॥ जैसे चन्द्रोदयसे रात्रिकी शोभा बढ़ जाती है, उसी प्रकार भीमकुमारी दमयन्ती पतिसे मिलकर आलस्यका त्याग करके निश्चिन्त और हर्षोल्लसित हृदयसे पूर्णकाम होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलदमयन्तीसमागमे षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलदमयन्तीसमागमविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥