महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः । ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम् ॥ ४३ ॥ वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः । वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः ॥ ४४ ॥ श्रेष्ठ विद्याधरगण दिव्य मन्दार-कुसुमोंकी मालाओंसे आपकी पूजा करके सफलमनोरथ हो तुरंत आपके समीप पहुँच जाते हैं। गुह्यक, सात³ प्रकारके पितृगण तथा दिव्य मानव (सनकादि) आपकी ही पूजा करके श्रेष्ठ पदको प्राप्त करते हैं। वसुगण, मरुद्गण, रुद्र, साध्य तथा आपकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य आदि सिद्ध महर्षि आपकी ही आराधनासे सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ हुए हैं ॥ ४२-४४ ॥ सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च । न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते ॥ ४५ ॥ सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च । न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव ॥ ४६ ॥ ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः । त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः ॥ ४७ ॥ त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा । देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना ॥ ४८ ॥ ब्रह्मलोकसहित ऊपरके सातों लोकोंमें तथा अन्य सब लोकोंमें भी ऐसा कोई प्राणी नहीं दीखता जो आप भगवान् सूर्यसे बढ़कर हो। भगवन्! जगत्में और भी बहुत-से महान् शक्तिशाली प्राणी हैं; परंतु उनकी कान्ति और प्रभाव आपके समान नहीं हैं। सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ आपके ही अन्तर्गत हैं। आप ही समस्त ज्योतियोंके स्वामी हैं। सत्य, सत्त्व तथा समस्त सात्त्विक भाव आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। 'शार्ङ्ग' नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने जिसके द्वारा दैत्योंका घमंड चूर्ण किया है उस सुदर्शन चक्रको विश्वकर्माने आपके ही तेजसे बनाया है ॥ ४५—४८ ॥ त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम् । सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि ॥ ४९ ॥ आप ग्रीष्म-ऋतुमें अपनी किरणोंसे समस्त देहधारियोंके तेज और सम्पूर्ण ओषधियोंके रसका सार खींचकर पुनः वर्षाकालमें उसे बरसा देते हैं ॥ ४९ ॥ तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः । विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः ॥ ५० ॥ वर्षा-ऋतुमें आपकी कुछ किरणें तपती हैं, कुछ जलाती हैं, कुछ मेघ बनकर गरजती, बिजली बनकर चमकती तथा वर्षा भी करती हैं ॥ ५० ॥ न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः ।