भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 609

स्नातमात्रस्य तत् सर्वं नश्यते नात्र संशयः । पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ १९९ ॥

राजन्! उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो सूर्यग्रहणके समय अमावास्याको वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो—। भलीभाँति सम्पन्न किये हुए सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका जो फल होता है, उसे मनुष्य उस तीर्थमें स्नानमात्र करके अथवा श्राद्ध करके पा लेता है। स्त्री या पुरुषने जो कुछ भी दुष्कर्म किया हो, वह सब वहाँ स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। वह पुरुष कमलके समान रंगवाले विमानद्वारा ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १९६—१९९ ॥

अभिवाद्य ततो यक्षं द्वारपालं मचक्रुकम् । कोटितीर्थमुपस्पृश्य लभेद बहुसुवर्णकम् ॥ २०० ॥

तदनन्तर मचक्रुक नामक द्वारपाल यक्षको प्रणाम करके कोटितीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको प्रचुर सुवर्ण-राशिकी प्राप्ति होती है ॥ २०० ॥

गङ्गाह्रदश्च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नायीत धर्मज्ञ ब्रह्मचारी समाहितः ॥ २०१ ॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः ।

धर्मज्ञ भरतश्रेष्ठ! वहीं गंगाह्रद नामक तीर्थ है, उसमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो स्नान करे, इससे मनुष्यको राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंद्वारा मिलनेवाले फलकी प्राप्ति होती है ॥ २०१ १/२ ॥

पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम् ॥ २०२ ॥ त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद् वायुना समुदीरिताः ॥ २०३ ॥ अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् । दक्षिणेन सरस्वत्या उत्तरेण दृषद्वतीम् ॥ २०४ ॥ ये वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे ।

भूमण्डलके निवासियोंके लिये नैमिष, अन्तरिक्ष-निवासियोंके लिये पुष्कर और तीनों लोकोंके निवासियोंके लिये कुरुक्षेत्र विशिष्ट तीर्थ हैं। कुरुक्षेत्रसे वायुद्वारा उड़ायी हुई धूल भी पापी-से-पापी मनुष्यपर भी पड़ जाय तो उसे परमगतिको पहुँचा देती है। सरस्वतीसे दक्षिण, दृषद्वतीसे उत्तर कुरुक्षेत्रमें जो लोग निवास करते हैं, वे मानो स्वर्गलोकमें बसते हैं ॥ २०२—२०४ १/२ ॥

कुरुक्षेत्रे गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् ॥ २०५ ॥ अप्येकां वाचमुत्सृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

‘मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा, कुरुक्षेत्रमें निवास करूँगा’ ऐसी बात एक बार मुँहसे कह देनेपर भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २०५ १/२ ॥