महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततः शाकम्भरीत्येव नाम तस्याः प्रतिष्ठितम्।
शाकम्भरीं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः॥ १६॥
त्रिरात्रमुषितः शाकं भक्षयित्वा नरः शुचिः।
शाकाहारस्य यत् किंचिद् वर्षैर्द्वादशभिः कृतम्॥ १७॥
तत् फलं तस्य भवति देव्याश्छन्देन भारत।
भारत! तबसे उस देवीका 'शाकम्भरी' ही नाम प्रसिद्ध हो गया। शाकम्भरीके समीप जाकर मनुष्य ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक एकाग्रचित्त और पवित्र हो वहाँ तीन राततक शाक खाकर रहे तो बारह वर्षोंतक शाकाहारी मनुष्यको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह उसे देवीकी इच्छासे (तीन ही दिनोंमें) मिल जाता है॥ १६-१७ १/२॥
ततो गच्छेत् सुवर्णाख्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ १८॥
तत्र विष्णुः प्रसादार्थं रुद्रमाराधयत् पुरा।
वरांश्च सुबहूँल्लेभे दैवतेषु सुदुर्लभान्॥ १९॥
तदनन्तर त्रिभुवनविख्यात सुवर्णतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने रुद्रदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी आराधना की और उनसे अनेक देवदुर्लभ उत्तम वर प्राप्त किये॥ १८-१९॥
उक्तश्च त्रिपुरघ्नेन परितुष्टेन भारत।
अपि च त्वं प्रियतरो लोके कृष्ण भविष्यसि॥ २०॥
त्वन्मुखं च जगत् सर्वं भविष्यति न संशयः।
तत्राभिगम्य राजेन्द्र पूजयित्वा वृषध्वजम्॥ २१॥
अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति।
धूमावतीं ततो गच्छेत् त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ २२॥
मनसा प्रार्थितान् कामाँल्लभते नात्र संशयः।
भारत! उस समय संतुष्टचित्त त्रिपुरारि शिवने श्रीविष्णुसे कहा—'श्रीकृष्ण! तुम मुझे लोकमें अत्यन्त प्रिय होओगे। संसारमें सर्वत्र तुम्हारी ही प्रधानता होगी, इसमें संशय नहीं है।' राजेन्द्र! उस तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और गणपतिपद प्राप्त कर लेता है। वहाँसे मनुष्य धूमावतीतीर्थको जाए और तीन रात उपवास करे। इससे वह निःसंदेह मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ २०—२२ १/२॥
देव्यास्तु दक्षिणार्धेन रथावर्तो नराधिप॥ २३॥
तत्रारोहेत धर्मज्ञ श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।
महादेवप्रसादाद्धि गच्छेत परमां गतिम्॥ २४॥
नरेश्वर! देवीसे दक्षिणार्ध भागमें रथावर्त नामक तीर्थ है। धर्मज्ञ! जो श्रद्धालु एवं जितेन्द्रिय पुरुष उस तीर्थकी यात्रा करता है, वह महादेवजीके प्रसादसे परम गति प्राप्त कर