महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर उर्वशीतीर्थ, सोमाश्रम और कुम्भ-कर्णाश्रमकी यात्रा करके मनुष्य इस भूतलपर पूजित होता है ।। १५७ ।। कोकामुखमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी यतव्रतः । जातिस्मरत्वमाप्नोति दृष्टमेतत् पुरातनैः ।। १५८ ।। कोकामुखतीर्थमें स्नान करके ब्रह्मचर्य एवं संयम-नियमका पालन करनेवाला पुरुष पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है। यह बात प्राचीन पुरुषोंने प्रत्यक्ष देखी है ।। १५८ ।। प्राङ्नदीं च समासाद्य कृतात्मा भवति द्विजः । सर्वपापविशुद्धात्मा शक्रलोकं च गच्छति ।। १५९ ।। प्राङ्नदीतीर्थमें जानेसे द्विज कृतार्थ हो जाता है। वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर इन्द्रलोकमें जाता है ।। ऋषभद्वीपमासाद्य मेध्यं क्रौञ्चनिषूदनम् । सरस्वत्यामुपस्पृश्य विमानस्थो विराजते ।। १६० ।। तीर्थसेवी मनुष्य पवित्र ऋषभद्वीप और क्रौञ्चनिषूदनतीर्थमें जाकर सरस्वतीमें स्नान करनेसे विमानपर विराजमान होता है ।। १६० ।। औद्दालकं महाराज तीर्थं मुनिनिषेवितम् । तत्राभिषेकं कृत्वा वै सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। १६१ ।। महाराज! मुनियोंसे सेवित औद्दालकतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। १६१ ।। धर्मतीर्थं समासाद्य पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम् । वाजपेयमवाप्नोति विमानस्थश्च पूज्यते ।। १६२ ।। परम पवित्र ब्रह्मर्षिसेवित धर्मतीर्थमें जाकर स्नान करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और विमानपर बैठकर पूजित होता है ।। १६२ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां चतुरशीतितमोऽध्यायः ।। ८४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें पुलस्त्यकी तीर्थयात्रासे सम्बन्ध रखनेवाला चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८४ ।।
* शम्याका अर्थ है डंडा। कोई बलवान् पुरुष डंडेको खूब जोर लगाकर फेंके तो वह जहाँ गिरे, उतनी दूरके स्थानको एक शम्यानिपात कहते हैं। ऐसे ही छः शम्यानिपातकी दूरी समझ लेनी चाहिये।
* तिलोंसे गौकी आकृति बनाकर उसका दान करे।