भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 633

वाजपेयमवाप्नोति देवैः सर्वैश्च पूज्यते ।
तदनन्तर पुण्यशोभिता पुण्यमयी लपेटिकामें जाकर स्नान करे। ऐसा करनेसे तीर्थयात्री वाजपेययज्ञका फल पाता और सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होता है ।। १५ १/२ ।।
ततो महेन्द्रमासाद्य जामदग्न्यनिषेवितम् ।। १६ ।।
रामतीर्थे नरः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् ।
इसके बाद परशुरामसेवित महेन्द्रपर्वतपर जाकर वहाँके रामतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ।। १६ १/२ ।।
मतङ्गस्य तु केदारस्तत्रैव कुरुनन्दन ।। १७ ।।
तत्र स्नात्वा कुरुश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् ।
कुरुश्रेष्ठ कुरुनन्दन! वहीं मतंगका केदार है, उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ।। १७ १/२ ।।
श्रीपर्वतं समासाद्य नदीतीरमुपस्पृशेत् ।। १८ ।।
अश्वमेधमवाप्नोति पूजयित्वा वृषध्वजम् ।
श्रीपर्वतपर जाकर वहाँकी नदीके तटपर स्नान करे। वहाँ भगवान् शंकरकी पूजा करके मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ।। १८ १/२ ।।
श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः ।। १९ ।।
न्यवसत् परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह ।
तत्र देवह्रदे स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः ।। २० ।।
अश्वमेधमवाप्नोति परां सिद्धिं च गच्छति ।
ऋषभं पर्वतं गत्वा पाण्ड्ये देवतपूजितम् ।
वाजपेयमवाप्नोति नाकपृष्ठे च मोदते ।। २१ ।।
श्रीपर्वतपर देवी पार्वतीके साथ महातेजस्वी महादेवजी बड़ी प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं। देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी वहाँ रहते हैं। वहाँ देवकुण्डमें स्नान करके पवित्र हो जितात्मा पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता और परम सिद्धि लाभ करता है। पाण्ड्यदेशमें देवपूजित ऋषभ पर्वतपर जाकर तीर्थयात्री वाजपेययज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें आनन्दित होता है ।। १९—२१ ।।
ततो गच्छेत कावेरीं वृतामप्सरसां गणैः ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ।। २२ ।।
राजन्! तदनन्तर अप्सराओंसे आवृत कावेरी नदीकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ।। २२ ।।
ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातीर्थमुपस्पृशेत् ।
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। २३ ।।