भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 635

रूपस्य भागी भवति सुभगश्च प्रजापते । राजन्! वहाँ ब्रह्मर्षि संवर्तकी दुर्लभ बावली है। उसमें स्नान करके मनुष्य सुन्दररूपका भागी और सौभाग्यशाली होता है ।। ३१ १/२ ।। ततो वेणां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।। ३२ ।। मयूरहंससंयुक्तं विमानं लभते नरः । तदनन्तर वेणा नदीके तटपर जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य (मृत्युके पश्चात्) मोर और हंसोंसे जुता हुआ विमानको प्राप्त करता है ।। ३२ १/२ ।। ततो गोदावरीं प्राप्य नित्यं सिद्धनिषेविताम् ।। ३३ ।। गवां मेधमवाप्नोति वासुकेर्लोकमुत्तमम् । वेणायाः संगमे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।। ३४ ।। तत्पश्चात् सदा सिद्ध पुरुषोंसे सेवित गोदावरीके तटपर जाकर स्नान करनेसे तीर्थयात्री गोमेधयज्ञका फल पाता और वासुकिके लोकमें जाता है। वेणासंगममें स्नान करके मनुष्य अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है ।। वरदासंगमे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । ब्रह्मस्थानं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।। ३५ ।। गोसहस्रफलं विन्द्यात् स्वर्गलोकं च गच्छति । वरदासंगमतीर्थमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। ब्रह्मस्थानमें जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ३५ १/२ ।। कुशप्लवनमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।। ३६ ।। त्रिरात्रमुषितः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् । कुशप्लवनतीर्थमें जाकर स्नान करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो तीन रात निवास करनेवाला पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ।। ३६ १/२ ।। ततो देवह्रदेऽरण्ये कृष्णवेणाजलोद्भवे ।। ३७ ।। जातिस्मरह्रदे स्नात्वा भवेज्जातिस्मरो नरः । तदनन्तर कृष्णवेणाके जलसे उत्पन्न हुए रमणीय देवकुण्डमें, जिसे जातिस्मर ह्रद कहते हैं, स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेकी शक्तिवाला) होता है ।। ३७ १/२ ।। यत्र क्रतुशतैरिष्ट्वा देवराजो दिवं गतः ।। ३८ ।। अग्निष्टोमफलं विन्द्याद् गमनादेव भारत । सर्वदेवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।। ३९ ।।