महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! ऋषिप्रवर वाल्मीकि, कश्यप, आत्रेय, कुण्डजठर, विश्वामित्र, गौतम, असित, देवल, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, वसिष्ठ, उद्दालक मुनि, शौनक तथा पुत्रसहित तपोधनप्रवर व्यास, मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा और महातपस्वी जाबालि—ये सभी महर्षि जो तपस्याके धनी हैं, तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। इन सबके साथ उक्त तीर्थोंमें जाओ॥ ११९—१२२॥
एष ते लोमशो नाम महर्षिरमितद्युतिः।
समेष्यति महाराज तेन सार्धमनुव्रज॥ १२३॥
महाराज! ये अमिततेजस्वी महर्षि लोमश तुम्हारे पास आनेवाले हैं, उन्हें साथ लेकर यात्रा करो॥ १२३॥
मयापि सह धर्मज्ञ तीर्थान्येतान्यनुक्रमात्।
प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं यथा राजा महाभिषः॥ १२४॥
धर्मज्ञ! इस यात्रामें मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा। प्राचीन राजा महाभिषके समान तुम भी क्रमशः इन तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए महान् यश प्राप्त करोगे॥ १२४॥
यथा ययातिर्धर्मात्मा यथा राजा पुरूरवाः।
तथा त्वं राजशार्दूल स्वेन धर्मेण शोभसे॥ १२५॥
यथा भगीरथो राजा यथा रामश्च विश्रुतः।
तथा त्वं सर्वराजभ्यो भ्राजसे रश्मिवानिव॥ १२६॥
नृपश्रेष्ठ! जैसे धर्मात्मा ययाति तथा राजा पुरूरवा थे वैसे ही तुम भी अपने धर्मसे सुशोभित हो रहे हो। जैसे राजा भगीरथ तथा विख्यात महाराज श्रीराम हो गये हैं, उसी प्रकार तुम भी सूर्यकी भाँति सब राजाओंसे अधिक शोभा पा रहे हो॥ १२५-१२६॥
यथा मनुर्यथैक्ष्वाकुर्यथा पूरुर्महायशाः।
यथा वैन्यो महाराज तथा त्वमपि विश्रुतः॥ १२७॥
यथा च वृत्रहा सर्वान् सपत्नान् निर्दहन् पुरा।
त्रैलोक्यं पालयामास देवराड् विगतज्वरः॥ १२८॥
तथा शत्रुक्षयं कृत्वा त्वं प्रजाः पालयिष्यसि।
स्वधर्मविजितामुर्वीं प्राप्य राजीवलोचन॥ १२९॥
ख्यातिं यास्यसि धर्मेण कार्तवीर्यार्जुनो यथा॥ १३०॥
महाराज! जैसे मनु, जैसे इक्ष्वाकु, जैसे महायशस्वी पूरु और जैसे वेननन्दन पृथु हो गये हैं वैसी ही तुम्हारी भी ख्याति है। पूर्वकालमें वृत्रासुरविनाशक देवराज इन्द्रने जैसे सब शत्रुओंका संहार करते हुए निश्चिन्त होकर तीनों लोकोंका पालन किया था, उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंका नाश करके प्रजाका पालन करोगे। कमलनयन नरेश! तुम अपने धर्मसे जीती हुई पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त करके स्वधर्मपालनद्वारा कार्तवीर्य अर्जुनके समान विख्यात होओगे॥ १२७—१३०॥