महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 661, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंबह्वाश्चर्यं महाराज दृश्यते तत्र पर्वते । पुण्ये स्वर्गोपमे चैव देवर्षिगणसेविते ॥ ८ ॥ राजन्! देवर्षिगणोंसे सेवित वह पुण्यपर्वत स्वर्गके समान सुन्दर एवं सुखद है। वहाँ अनेक आश्चर्यकी बातें देखी जाती हैं ॥ ८ ॥ ह्रदिनी पुण्यतीर्था च राजर्षेस्तत्र वै सरित् । विश्वामित्रनदी राजन् पुण्या परपुरंजय ॥ ९ ॥ यस्यास्तीरे सतां मध्ये ययातिर्नहुषात्मजः । पपात स पुनर्लोकाँल्लेभे धर्मान् सनातनान् ॥ १० ॥ शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले नरेश! वहाँ राजर्षि विश्वामित्रकी तपस्यासे प्रकट हुई एक पुण्यमयी नदी है, जो परम पवित्र तीर्थ मानी गयी है। उसीके तटपर नहुषनन्दन राजा ययाति स्वर्गसे साधु पुरुषोंके बीचमें गिरे थे और पुनः सनातन धर्ममय लोकोंमें चले गये थे ॥ ९-१० ॥ तत्र पुण्यो ह्रदः ख्यातो मैनाकश्चैव पर्वत: । बहुमूलफलोपेतस्त्वसितो नाम पर्वत: ॥ ११ ॥ वहाँ पुण्यसरोवर, विख्यात मैनाक पर्वत और प्रचुर फलमूलोंसे सम्पन्न असित नामक पर्वत है ॥ ११ ॥ आश्रमः कक्षसेनस्य पुण्यस्तत्र युधिष्ठिर । च्यवनस्याश्रमश्चैव विख्यातस्तत्र पाण्डव ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! उसी पर्वतपर कच्छसेनका पुण्यदायक आश्रम है। पाण्डुनन्दन! महर्षि च्यवनका सुविख्यात आश्रम भी वहीं है ॥ १२ ॥ तत्राल्पेनैव सिध्यन्ति मानवास्तपसा विभो । जम्बूमार्गो महाराज ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ १३ ॥ आश्रमः शाम्यतां श्रेष्ठ मृगद्विजन्निषेवितः । प्रभो! वहाँ थोड़ी ही तपस्यासे मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। महाराज! पश्चिम दिशामें ही जम्बूमार्ग है, जहाँ शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षियोंका आश्रम है। शान्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! वह आश्रम पशु-पक्षियोंसे सेवित है ॥ १३ १/२ ॥ ततः पुण्यतमा राजन् सततं तापसैर्युता ॥ १४ ॥ केतुमाला च मेध्या च गङ्गाद्वारं च भूमिप । ख्यातं च सैन्धवारण्यं पुण्यं द्विजन्निषेवितम् ॥ १५ ॥ राजन्! उधर ही सदा तपस्वीजनोंसे भरे हुए पुण्यतम तीर्थ—केतुमाला, मेध्या और गङ्गाद्वार (हरिद्वार) हैं। भूपाल! द्विजोंसे सेवित सुप्रसिद्ध सैन्धवारण्य भी उधर ही है ॥ पितामहसरः पुण्यं पुष्करं नाम नामतः । वैखानसानां सिद्धानामृषीणामाश्रमः प्रियः ॥ १६ ॥