महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 673, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विनवतितमोऽध्यायः
महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना
लोमश उवाच
धनंजयेन चाप्युक्तं यत् तच्छृणु युधिष्ठिर ।
युधिष्ठिरं भ्रातरं मे योजयेर्धर्म्यया श्रिया ॥ १ ॥
त्वं हि धर्मान् परान् वेत्थ तपांसि च तपोधन ।
श्रीमतां चापि जानासि धर्मं राज्ञां सनातनम् ॥ २ ॥
लोमश मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! जब मैं आने लगा, तब अर्जुनने भी मुझसे जो बात कही थी, वह सुनो। वे बोले—'तपोधन! आप मेरे बड़े भैया युधिष्ठिरको धर्मानुकूल राजलक्ष्मीसे संयुक्त कीजिये। आप उत्कृष्ट धर्मों और तपस्याओंको जानते हैं। श्रीसम्पन्न राजाओंका जो सनातनधर्म है, उसका भी आपको पूर्ण ज्ञान है ॥ १-२ ॥
स भवान् परमं वेद पावनं पुरुषं प्रति ।
तेन संयोजयेथास्त्वं तीर्थपुण्येन पाण्डवान् ॥ ३ ॥
'पुरुषको पवित्र बनानेवाला जो उत्तम साधन है, उसे आप जानते हैं। अतः आप पाण्डवोंको तीर्थयात्रा-जनित पुण्यसे सम्पन्न कीजिये ॥ ३ ॥
यथा तीर्थानि गच्छेत गाश्च दद्यात् स पार्थिवः ।
तथा सर्वात्मना कार्यमिति मामर्जुनोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
'महाराज युधिष्ठिर जिस प्रकार तीर्थोंमें जायें और वहाँ गोदान करें, वैसा सब प्रकारसे प्रयत्न कीजियेगा।' यह बात अर्जुनने मुझसे कही थी ॥ ४ ॥
भवता चानुगुप्तोऽसौ चरेत् तीर्थानि सर्वशः ।
रक्षोभ्यो रक्षितव्यश्च दुर्गेषु विषमेषु च ॥ ५ ॥
उन्होंने यह भी कहा—'महाराज युधिष्ठिर आपसे सुरक्षित रहकर सब तीर्थोंमें विचरण करें। दुर्गम स्थानों और विषम अवसरोंमें आप राक्षसोंसे उनकी रक्षा करें ॥
दधीच इव देवेन्द्रं यथा चाप्यङ्गिरा रविम् ।
तथा रक्षस्व कौन्तेयान् राक्षसेभ्यो द्विजोत्तम ॥ ६ ॥
'द्विजश्रेष्ठ! जैसे दधीचने देवराज इन्द्रकी और महर्षि अंगिराने सूर्यकी रक्षा की है, उसी प्रकार आप राक्षसोंसे कुन्तीकुमारोंकी रक्षा कीजिये' ॥ ६ ॥
यातुधाना हि बहवो राक्षसाः पर्वतोपमाः ।