भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 675

युधिष्ठिर बोले— महर्षे! आपके दर्शन और आपकी बातोंके सुननेसे मुझे इतना अधिक हर्ष हुआ है कि मुझे इन वचनोंका कोई उत्तर नहीं सूझता। देवराज इन्द्र जिसका स्मरण करते हों उससे बढ़कर इस संसारमें कौन है? ।। भवता संगमो यस्य भ्राता चैव धनंजयः । वासवः स्मरते यस्य को नामाभ्यधिकस्ततः ॥ १५ ॥ जिसे आपका संग प्राप्त हो, जिसके अर्जुन-जैसा भाई हो और जिसे इन्द्र याद करते हों, उससे बढ़कर सौभाग्यशाली और कौन है? ॥ १५ ॥ यच्च मां भगवानाह तीर्थानां दर्शनं प्रति । धौम्यस्य वचनादेषा बुद्धिः पूर्वं कृतैव मे ॥ १६ ॥ भगवन्! आपने मुझे तीर्थोंके दर्शनके लिये जो उत्साह प्रदान किया है, वह ठीक है। मैंने पहलेसे ही धौम्यजीके आदेशसे तीर्थोंमें जानेका विचार कर रखा है ।। तद् यदा मन्यसे ब्रह्मन् गमनं तीर्थदर्शने । तदैव गन्तास्मि तीर्थान्येष मे निश्चयः परः ॥ १७ ॥ अतः ब्रह्मन्! आप जब ठीक समझें तभी मैं तीर्थोंके दर्शनके लिये चल दूँगा; यही मेरा अन्तिम निश्चय है ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच

गमने कृतबुद्धिं तु पाण्डवं लोमशोऽब्रवीत् । लघुर्भव महाराज लघुः स्वैरं गमिष्यसि ॥ १८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तीर्थयात्राके लिये जिन्होंने निश्चित विचार कर लिया था, उन पाण्डु-नन्दन युधिष्ठिरसे महर्षि लोमशने कहा—'महाराज! लोकसमूहसे आप हलके हो जाइये—थोड़े ही लोगोंको साथ रखिये; क्योंकि थोड़े संगी-साथी होनेपर आप इच्छानुसार सर्वत्र जा सकेंगे ॥ १८ ॥

युधिष्ठिर उवाच

भिक्षाभुजो निवर्तन्तां ब्राह्मणा यतयश्च ये । क्षुत्तृडध्वश्रमायासाशीतार्तिमसहिष्णवः ॥ १९ ॥ युधिष्ठिर बोले— जो भिक्षाभोजी ब्राह्मण और संन्यासी हैं तथा जो भूख-प्यास, परिश्रम-थकावट और सर्दीकी पीड़ा सहन न कर सकें, उन्हें लौट जाना चाहिये ॥ १९ ॥ ते सर्वे विनिवर्तन्तां ये च मिष्टभुजो द्विजाः । पक्वान्नलेह्यपानानां मांसानां च विकल्पकाः ॥ २० ॥ जो द्विज मिष्टान्नभोजी हैं वे भी लौट जायँ। जो पक्वान्न, चटनी, पेय पदार्थ और मांस आदि खानेवाले मनुष्य हों, वे भी लौट जायँ ॥ २० ॥ तेऽपि सर्वे निवर्तन्तां ये च सूदानुयायिनः ।