महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 684, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजहुः सर्वपापानि श्रेयश्च प्रतिपेदिरे । एवमादानवन्तश्च निरादानाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥ तीर्थान्यगच्छन् विबुधास्तेनापुर्भूतिमुत्तमाम् । (यत्र धर्मेण वर्तन्ते राजानो राजसत्तम । सर्वान् सपत्नान् बाधन्ते राज्यं चैषां विवर्धते ॥) तथा त्वमपि राजेन्द्र स्नात्वा तीर्थेषु सानुजः ॥ १६ ॥ पुनर्वेत्स्यसि तां लक्ष्मीमेष पन्थाः सनातनः । यशोहीन दैत्य पूर्णतः विनष्ट हो गये, किंतु धर्मशील देवताओंने पवित्र समुद्रों, सरिताओं, सरोवरों और पुण्यप्रद आश्रमोंकी यात्रा की। पाण्डुनन्दन! वहाँ तपस्या, यज्ञ और दान आदि करके महात्माओंके आशीर्वादसे वे सब पापोंसे मुक्त हो कल्याणके भागी हुए। इस प्रकार उत्तम नियम ग्रहण करके किसीसे भी कोई प्रतिग्रह न लेकर देवताओंने तीर्थोंमें विचरण किया; इससे उन्हें उत्तम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। नृपश्रेष्ठ! जहाँ राजा धर्मके अनुसार बर्ताव करते हैं वहाँ वे सब शत्रुओंको नष्ट कर देते हैं और उनका राज्य भी बढ़ता रहता है। राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भाइयोंसहित तीर्थोंमें स्नान करके खोयी हुई राजलक्ष्मी प्राप्त कर लोगे। यही सनातन मार्ग है ॥ १३—१६ १/२ ॥
यथैव हि नृगो राजा शिबिरौशीनरो यथा ॥ १७ ॥ भगीरथो वसुमना गयः पूरुः पुरूरवाः । चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते ॥ १८ ॥ तीर्थाभिगमनात् पूता दर्शनाच्च महात्मनाम् । अलभन्त यशः पुण्यं धनानि च विशाम्पते ॥ १९ ॥ तथा त्वमपि राजेन्द्र लब्धासि विपुलां श्रियम् । जैसे राजा नृग, उशीनरपुत्र शिबि, भगीरथ, वसुमना, गय, पूरु तथा पुरूरवा आदि नरेशोंने सदा तपस्यापूर्वक तीर्थयात्रा करके वहाँके जलके स्पर्श और महात्माओंके दर्शनसे पावन यश और प्रचुर धन प्राप्त किये थे; उसी प्रकार तुम भी तीर्थयात्राके पुण्यसे विपुल सम्पत्ति प्राप्त कर लोगे ॥ १७—१९ १/२ ॥
यथा चेक्ष्वाकुरभवत् सपुत्रजनबान्धवः ॥ २० ॥ मुचुकुन्दोऽथ मान्धाता मरुत्तश्च महीपतिः । कीर्तिं पुण्यामविन्दन्त यथा देवास्तपोबलात् ॥ २१ ॥ देवर्षयश्च कार्त्स्न्येन तथा त्वमपि वेत्स्यसि । धार्तराष्ट्रास्त्वधर्मेण मोहेन च वशीकृताः । न चिराद् वै विनङ्क्ष्यन्ति दैत्या इव न संशयः ॥ २२ ॥ जैसे पुत्र, सेवक तथा बन्धु-बान्धवोंसहित राजा इक्ष्वाकु, मुचुकुन्द, मान्धाता तथा महाराज मरुत्तने पुण्यकीर्ति प्राप्त की थी, जैसे देवताओं और देवर्षियोंने तपोबलसे यश