भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 689

भरतनन्दन! उस यज्ञमें दक्षिणा देते समय जो वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होती थी वह स्वर्गलोकतक गूँज उठती थी। उस वेदध्वनिके सामने दूसरा कोई शब्द नहीं सुनायी पड़ता था ॥ २२ ॥

पुण्येन चरता राजन् भूर्दिशः खं नभस्तथा । आपूर्णामासीच्छब्देन तदप्यासीन्महाद्भुतम् ॥ २३ ॥ यत्र स्म गाथा गायन्ति मनुष्या भरतर्षभ । अन्नपानैः शुभैस्तृप्ता देशे देशे सुवर्चसः ॥ २४ ॥ राजन्! वहाँ सब ओर फैले हुए पुण्यमय शब्दसे पृथ्वी, दिशाएँ, स्वर्ग और आकाश परिपूर्ण हो गये। यह बड़ी ही अद्भुत बात थी। भरतश्रेष्ठ! उस यज्ञमें सब मनुष्य यह गाथा गाते रहते थे कि ‘इस यज्ञमें देश-देशके अत्यन्त तेजस्वी पुरुष उत्तम अन्नपानसे तृप्त हो रहे हैं’ ॥ २३-२४ ॥

गयस्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः । तत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ॥ २५ ॥ ‘गयके यज्ञमें लोग यही पूछते फिरते थे कि ‘कौन-कौन ऐसे प्राणी रह गये हैं जो अभी भोजन करना चाहते हैं?’ वहाँ खानेसे बचे हुए अन्नके पचीस पर्वत शेष रह गये थे ॥ २५ ॥

न तत् पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । गयो यदकरोद् यज्ञे राजर्षिरमितद्युतिः ॥ २६ ॥ ‘अमिततेजस्वी राजर्षि गयने अपने यज्ञमें जो व्यय किया था, वह पहलेके राजाओंने भी नहीं किया था और भविष्यमें भी कोई दूसरे कर सकेंगे, ऐसा सम्भव नहीं है ॥

कथं तु देवा हविषा गयेन परितर्पिताः । पुनः शक्ष्यन्त्युपादातुमन्यैर्दत्तानि कानिचित् ॥ २७ ॥ ‘गयने सम्पूर्ण देवताओंको हविष्यसे भलीभाँति तृप्त कर दिया है, अब वे दूसरोंके दिये हुए हविष्यको कैसे ग्रहण कर सकेंगे? ॥ २७ ॥

सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः । यथा वा वर्षतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् । तथा गणयितुं शक्या गययज्ञे न दक्षिणाः ॥ २८ ॥ ‘जैसे लोकमें बालूके कण, आकाशके तारे और बरसते हुए बादलोंकी जलधाराएँ किसीके द्वारा भी गिनी नहीं जा सकतीं, उसी प्रकार गयके यज्ञमें दी हुई दक्षिणाओंकी भी कोई गणना नहीं कर सकता था ॥ २८ ॥

एवंविधाः सुबहवस्तस्य यज्ञा महीपतेः । बभूवुरस्य सरसः समीपे कुरुनन्दन ॥ २९ ॥ कुरुनन्दन! महाराज गयके ऐसे ही बहुत-से यज्ञ इस ब्रह्मसरोवरके समीप सम्पन्न हुए हैं ॥ २९ ॥