महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 692, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत्य च भोजयति ततो विप्रं जिघांसति ॥ ८ ॥ एक दिन दितिनन्दन इल्वलने एक तपस्वी ब्राह्मणसे कहा—'भगवन्! आप मुझे ऐसा पुत्र दें, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हो।' उन ब्राह्मणदेवताने इल्वलको इन्द्रके समान पुत्र नहीं दिया। इससे वह असुर उन ब्राह्मणदेवतापर बहुत कुपित हो उठा। राजन्! तभीसे इल्वल दैत्य क्रोधमें भरकर ब्राह्मणोंकी हत्या करने लगा। वह मायावी अपने भाई वातापिको मायासे बकरा बना देता था। वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ था! अतः वह क्षणभरमें भेड़ा और बकरा बन जाता था। फिर इल्वल उस भेड़ या बकरेको पकाकर उसका मांस राँधता और किसी ब्राह्मणको खिला देता था। इसके बाद वह ब्राह्मणको मारनेकी इच्छा करता था ॥ ५—८ ॥
स चाह्वयति यं वाचा गतं वैवस्वतक्षयम् । स पुनर्देहमास्थाय जीवन् स्म प्रत्यदृश्यत ॥ ९ ॥ इल्वलमें यह शक्ति थी कि वह जिस किसी भी यमलोकमें गये हुए प्राणीको उसका नाम लेकर बुलाता वह पुनः शरीर धारण करके जीवित दिखायी देने लगता था ॥ ९ ॥
ततो वातापिमसुरं छागं कृत्वा सुसंस्कृतम् । तं ब्राह्मणं भोजयित्वा पुनरेव समाह्वयत् ॥ १० ॥ उस दिन वातापि दैत्यको बकरा बनाकर इल्वल उसके मांसका संस्कार किया और उन ब्राह्मणदेवको वह मांस खिलाकर पुनः अपने भाईको पुकारा ॥ १० ॥
तामिल्वलेन महता स्वरेण वाचमीरिताम् । श्रुत्वातिमायो बलवान् क्षिप्रं ब्राह्मणकण्टकः ॥ ११ ॥ तस्य पार्श्वं विनिर्भिद्य ब्राह्मणस्य महासुरः । वातापिः प्रहसन् राजन् निश्चक्राम विशाम्पते ॥ १२ ॥ राजन्! इल्वलके द्वारा उच्चस्वरसे बोली हुई वाणी सुनकर वह अत्यन्त मायावी ब्राह्मणशत्रु बलवान् महादैत्य वातापि उस ब्राह्मणकी पसलीको फाड़कर हँसता हुआ निकल आया ॥ ११-१२ ॥
एवं स ब्राह्मणान् राजन् भोजयित्वा पुनः पुनः । हिंसयामास दैतेय इल्वलो दुष्टचेतनः ॥ १३ ॥ राजन्! इस प्रकार दुष्टहृदय इल्वल दैत्य बार-बार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपने भाईद्वारा उनकी हिंसा करा देता था (इसीलिये अगस्त्यमुनिने वातापिको नष्ट किया था) ॥ १३ ॥
अगस्त्यश्चापि भगवानेतस्मिन् काल एव तु । पितॄन् ददर्श गर्ते वै लम्बमानानधोमुखान् ॥ १४ ॥ इन्हीं दिनों भगवान् अगस्त्यमुनि कहीं चले जा रहे थे। उन्होंने एक जगह अपने पितरोंको देखा जो एक गड्ढेमें नीचे मुँह किये लटक रहे थे ॥ १४ ॥