महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 694, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरिष्ये पितरः कामं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥ १८ ॥ तब सत्यधर्मपरायण तेजस्वी अगस्त्यने उनसे कहा—'पितरो! मैं आपकी इच्छा पूर्ण करूँगा। आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये' ॥ १८ ॥
ततः प्रसवसंतानं चिन्तयन् भगवानृषिः । आत्मनः प्रसवस्यार्थे नापश्यत् सदृशीं स्त्रियम् ॥ १९ ॥ तब भगवान् महर्षि अगस्त्यने संतानोत्पादनकी चिन्ता करते हुए अपने अनुरूप संतानको गर्भमें धारण करनेके लिये योग्य पत्नीका अनुसंधान किया, परंतु उन्हें कोई योग्य स्त्री दिखायी नहीं दी ॥ १९ ॥
स तस्य तस्य सत्त्वस्य तत् तदङ्गमनुत्तमम् । संगृह्य तत्समैरङ्गैर्निर्ममे स्त्रियमुत्तमाम् ॥ २० ॥ तब उन्होंने एक-एक जन्तुके उत्तमोत्तम अंगोंका भावनाद्वारा संग्रह करके उन सबके द्वारा एक परम सुन्दर स्त्रीका निर्माण किया ॥ २० ॥
स तां विदर्भराजस्य पुत्रार्थं तप्यतस्तपः । निर्मितामात्मनोऽर्थाय मुनिः प्रादान्महातपाः ॥ २१ ॥ उन दिनों विदर्भराज पुत्रके लिये तपस्या कर रहे थे। महातपस्वी अगस्त्यमुनिने अपने लिये निर्मित की हुई वह स्त्री राजाको दे दी ॥ २१ ॥
सा तत्र जज्ञे सुभगा विद्युत् सौदामनी यथा । विभ्राजमाना वपुषा व्यवर्धत शुभानना ॥ २२ ॥ उस सुन्दरी कन्याका उस राजभवनमें बिजलीके समान प्रादुर्भाव हुआ। वह शरीरसे प्रकाशमान हो रही थी। उसका मुख बहुत सुन्दर था, वह राजकन्या वहाँ दिनोदिन बढ़ने लगी ॥ २२ ॥
जातमात्रां च तां दृष्ट्वा वैदर्भः पृथिवीपतिः । प्रहर्षेण द्विजातिभ्यो न्यवेदयत भारत ॥ २३ ॥ भरतनन्दन! राजा विदर्भने उस कन्याके उत्पन्न होते ही हर्षमें भरकर ब्राह्मणोंको यह शुभ संवाद सुनाया ॥
अभ्यनन्दन्त तां सर्वे ब्राह्मणा वसुधाधिप । लोपामुद्रेति तस्याश्च चक्रिरे नाम ते द्विजाः ॥ २४ ॥ राजन्! उस समय सब ब्राह्मणोंने राजाका अभिनन्दन किया और उस कन्याका नाम 'लोपामुद्रा' रख दिया ॥ २४ ॥
ववृधे सा महाराज बिभ्रती रूपमुत्तमम् । अप्सुवोत्पलिनी शीघ्रमग्नेरिव शिखा शुभा ॥ २५ ॥ महाराज! उत्तम रूप धारण करनेवाली वह राजकुमारी जलमें कमलिनी तथा यज्ञवेदीपर प्रज्वलित शुभ्र अग्निशिखाकी भाँति शीघ्रतापूर्वक बढ़ने लगी ॥ २५ ॥