महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनके शुभागमनका उद्देश्य था दशरथनन्दन श्रीरामके बल-पराक्रमकी परीक्षा करना। महाराज दशरथने जब सुना कि परशुरामजी हमारे राज्यकी सीमापर आ गये हैं, तब उन्होंने मुनिकी अगवानीके लिये अपने पुत्र श्रीरामको भेजा। कुन्तीनन्दन! श्रीरामचन्द्रजी धनुष-बाण हाथमें लिये आकर खड़े हैं, यह देखकर परशुरामजीने हँसते हुए कहा—'राजेन्द्र! प्रभो! भूपाल! यदि तुममें शक्ति हो तो यत्नपूर्वक इस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ। यह वह धनुष है जिसके द्वारा मैंने क्षत्रियोंका संहार किया है' ।। ४४-४६१/२ ।।
इत्युक्तस्त्वाह भगवंस्त्वं नाधिक्षेप्तुमर्हसि ।। ४७ ।।
उनके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'भगवन्! आपको इस तरह आक्षेप नहीं करना चाहिये ।।
नाहमप्यधमो धर्मे क्षत्रियाणां द्विजातिषु ।
इक्ष्वाकूणां विशेषेण बाहुवीर्ये न कथनम् ।। ४८ ।।
'मैं भी समस्त द्विजातियोंमें क्षत्रियधर्मका पालन करनेमें अधम नहीं हूँ। विशेषतः इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय अपने बाहुबलकी प्रशंसा नहीं करते' ।। ४८ ।।
तमेवंवादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत् ।
अलं वै व्यपदेशेन धनुरायच्छ राघव ।। ४९ ।।
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर परशुरामजी बोले—'रघुनन्दन! बातें बनानेकी कोई आवश्यकता नहीं। यह धनुष लो और इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ' ।। ४९ ।।
ततो जग्राह रोषेण क्षत्रियर्षभसूदनम् ।
रामो दाशरथिर्दिव्यं हस्ताद् रामस्य कार्मुकम् ।। ५० ।।
धनुरारोपयामास सलील इव भारत ।
ज्याशब्दमकरोच्चैव स्मयमानः स वीर्यवान् ।। ५१ ।।
तब दशरथनन्दन श्रीरामजीने रोषपूर्वक परशुरामका वह वीर क्षत्रियोंका संहारक दिव्य धनुष उनके हाथसे ले लिया। भारत! उन्होंने लीलापूर्वक प्रत्यञ्चा चढ़ा दी। तत्पश्चात् पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने मुसकराते हुए धनुषकी टंकार फैलायी ।। ५०-५१ ।।
तस्य शब्दस्य भूतानि वित्रसन्त्यशनेरिव ।
अथाब्रवीत् तदा रामो रामं दाशरथिस्तदा ।। ५२ ।।
इदमारोपितं ब्रह्मन् किमन्यत् करवाणि ते ।
तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महात्मनः ।
शरमाकर्णदेशान्तमयमाकृष्यतामिति ।। ५३ ।।
बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान उस टंकार-ध्वनिको सुनकर सब प्राणी घबरा उठे। उस समय दशरथनन्दन श्रीरामने परशुरामजीसे कहा—'ब्रह्मन्! यह धनुष तो मैंने चढ़ा दिया अब और आपका कौन-सा कार्य करूँ?' तब जमदग्निनन्दन परशुरामने महात्मा