भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 721

विभिन्न स्थानोंमें अधिक शोभा पानेवाला महर्षि दधीचका वह मनोरम आश्रम स्वर्गके समान प्रतीत होता था। देवता लोग वहाँ आ पहुँचे ॥ १८ ॥ तत्रापश्यन् दधीचं ते दिवाकरसमद्युतिम् । जाज्वल्यमानं वपुषा यथा लक्ष्म्या पितामहम् ॥ १९ ॥ उन्होंने देखा, महर्षि दधीच भगवान् सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहे हैं। अपने शरीरकी दिव्य कान्तिसे साक्षात् ब्रह्माजीके समान जान पड़ते हैं ॥ १९ ॥

तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवाद्य प्रणम्य च । अयाचन्त वरं सर्वे यथोक्तं परमेष्ठिना ॥ २० ॥ राजन्! उस समय सब देवताओंने महर्षिके चरणोंमें अभिवादन एवं प्रणाम करके ब्रह्माजीने जैसे कहा था, उसी प्रकार उनसे वर माँगा ॥ २० ॥ ततो दधीचः परमप्रतीतः सुरोत्तमांस्तानिदमभ्युवाच । करोमि यद् वो हितमद्य देवाः स्वं चापि देहं स्वयमुत्सृजामि ॥ २१ ॥ तब महर्षि दधीचने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन श्रेष्ठ देवताओंसे इस प्रकार कहा—‘देवगण! आज मैं वही करूँगा, जिससे आपलोगोंका हित हो। अपने इस शरीरको मैं