महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 734, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्यथा हि न शक्यास्ते विना सागरशोषणम् ।। ११ ।। महर्षि अगस्त्यके सिवा दूसरा कौन है जो समुद्रका शोषण करनेमें समर्थ हो। समुद्रको सुखाये बिना वे दानव काबूमें नहीं आ सकते ।। ११ ।।
एतच्छ्रुत्वा तदा देवा विष्णुना समुदाहृतम् । परमेष्ठिनमाज्ञाप्य अगस्त्यस्याश्रमं ययुः ।। १२ ।। भगवान् विष्णुकी कही हुई यह बात सुनकर देवता ब्रह्माजीकी आज्ञा ले अगस्त्यके आश्रमपर गये ।।
तत्रापश्यन् महात्मानं वारुणिं दीप्ततेजसम् । उपास्यमानमृषिभिर्देवैरिव पितामहम् ।। १३ ।। वहाँ उन्होंने मित्रावरुणके पुत्र महात्मा अगस्त्यजीको देखा। उनका तेज उद्भासित हो रहा था। जैसे देवतालोग ब्रह्माजीके पास बैठते हैं, उसी प्रकार बहुत-से ऋषि-मुनि उनके निकट बैठे थे ।। १३ ।।
तेऽभिगम्य महात्मानं मैत्रावरुणिमच्युतम् । आश्रमस्थं तपोराशिं कर्मभिः स्वैरभिष्टुवन् ।। १४ ।। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले मित्रावरुण नन्दन तपोराशि महात्मा अगस्त्य आश्रममें ही विराजमान थे। देवताओंने समीप जाकर उनके अद्भुत कर्मोंका वर्णन करते हुए स्तुति प्रारम्भ की ।। १४ ।।
देवा ऊचुः
नहुषेणाभितप्तानां त्वं लोकानां गतिः पुरा । भ्रंशितश्च सुरैश्वर्यात् स्वर्लोकाल्लोककण्टकः ।। १५ ।। **देवता बोले—**भगवन्! पूर्वकालमें राजा नहुषके अन्यायसे संतप्त हुए लोकोंकी आपने ही रक्षा की थी। आपने ही उस लोककण्टक नरेशको देवेन्द्रपद तथा स्वर्गसे नीचे गिरा दिया था ।। १५ ।।
क्रोधात् प्रवृद्धः सहसा भास्करस्य नगोत्तमः । वचस्तवानतिक्रामन् विन्ध्यः शैलो न वर्धते ।। १६ ।। पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्य सूर्यदेवपर क्रोध करके जब सहसा बढ़ने लगा तब आपने ही उसे रोका था। आपकी आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए विन्ध्यगिरि आज भी बढ़ नहीं रहा है ।। १६ ।।
तमसा चावृते लोके मृत्युनाभ्यर्दिताः प्रजाः । त्वामेव नाथमासाद्य निर्वृतिं परमां गताः ।। १७ ।। विन्ध्यगिरिके बढ़नेसे जब सारे जगत्में अन्धकार छा गया और सारी प्रजा मृत्युसे पीड़ित होने लगी। उस समय आपको ही अपना रक्षक पाकर सबने अत्यन्त हर्षका अनुभव