भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 737, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 737

न च स्म तेषां वचनं चकार ॥ ७ ॥ यह देख सब देवता एक साथ मिलकर महान् पर्वतराज विन्ध्यके पास गये और अनेक उपायोंद्वारा उसके क्रोधका निवारण करने लगे; परंतु उसने उनकी बात नहीं मानी ॥ ७ ॥ अथाभिजग्मुर्मुनिमाश्रमस्थं तपस्विनं धर्मभृतां वरिष्ठम् । अगस्त्यमत्यद्भुतवीर्यवन्तं तं चार्थमूचुः सहिताः सुरास्ते ॥ ८ ॥ तब वे सब देवता मिलकर अपने आश्रमपर विराजमान धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तपस्वी अगस्त्य मुनिके पास गये, जो अद्भुत प्रभावशाली थे। वहाँ जाकर उन्होंने अपना प्रयोजन कह सुनाया ॥ ८ ॥

देवा ऊचुः सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं नक्षत्राणां गतिं तथा । शैलराजो वृणोत्येष विन्ध्यः क्रोधवशानुगः ॥ ९ ॥ तं निवारयितुं शक्तो नान्यः कश्चिद् द्विजोत्तम । ऋते त्वां हि महाभाग तस्मादेनं निवारय ॥ १० ॥ **देवता बोले—**द्विजश्रेष्ठ! यह पर्वतराज विन्ध्य क्रोधके वशीभूत होकर सूर्य और चन्द्रमाके मार्ग तथा नक्षत्रोंकी गतिको रोक रहा है। महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई इसका निवारण नहीं कर सकता। अतः आप चलकर इसे रोकिये ॥ ९-१० ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रः सुराणां शैलमभ्यगात् । सोऽभिगम्याब्रवीद् विन्ध्यं सदारः समुपस्थितः ॥ ११ ॥ देवताओंकी यह बात सुनकर विप्रवर अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्राके साथ विन्ध्यपर्वतके समीप गये और वहाँ उपस्थित हो उससे इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 737, कुल 2580 में से · BharatKosha