महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालेयास्तु यथा राजन् सुरैः सर्वैर्निषूदिताः । अगस्त्याद् वरमासाद्य तन्मे निगदतः शृणु ॥ १६ ॥ राजन्! सब देवताओंने अगस्त्यसे वर पाकर जिस प्रकार कालेय नामक दैत्योंका संहार किया, वह बता रहा हूँ, सुनो— ॥ १६ ॥ त्रिदशानां वचः श्रुत्वा मैत्रावरुणिरब्रवीत् । किमर्थमभियाताः स्थ वरं मत्तः कमिच्छथ । एवमुक्तास्ततस्तेन देवता मुनिमब्रुवन् ॥ १७ ॥ (सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा पुरन्दरपुरोगमाः ।) देवताओंकी बात सुनकर मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यने पूछा—'देवताओ! आपलोग किसलिये यहाँ पधारे हैं और मुझसे कौन-सा वर चाहते हैं?' उनके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रको आगे करके सब देवताओंने हाथ जोड़कर मुनिसे कहा— ॥ १७ ॥ एवं त्वयेच्छाम कृतं हि कार्यं महार्णवं पीयमानं महात्मन् । ततो वधिष्याम सहानुबन्धान् कालेयसंज्ञान् सुरविद्विषस्तान् ॥ १८ ॥ 'महात्मन्! हम आपके द्वारा यह कार्य सम्पन्न कराना चाहते हैं कि आप सारे महासागरके जलको पी जायँ। तदनन्तर हमलोग देवद्रोही कालेय नामक दानवोंका उनके बन्धु-बान्धवोंसहित वध कर डालेंगे' ॥ १८ ॥ त्रिदशानां वचः श्रुत्वा तथेति मुनिरब्रवीत् । करिष्ये भवतां कामं लोकानां च महत् सुखम् ॥ १९ ॥ देवताओंका यह कथन सुनकर महर्षि अगस्त्यने कहा—'बहुत अच्छा' मैं आपलोगोंका मनोरथ पूर्ण करूँगा। इससे सम्पूर्ण लोकोंको महान् सुख प्राप्त होगा ॥ १९ ॥ एवमुक्त्वा ततोऽगच्छत् समुद्रं सरितां पतिम् । ऋषिभिश्च तपःसिद्धैः सार्धं देवैश्च सुव्रत ॥ २० ॥ सुव्रत! ऐसा कहकर अगस्त्यजी देवताओं तथा तपःसिद्ध ऋषियोंके साथ नदीपति समुद्रके तटपर गये ॥ मनुष्योरगगन्धर्वयक्षकिंपुरुषास्तथा । अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ॥ २१ ॥ उस समय मनुष्य, नाग, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर सभी उस अद्भुत दृश्यको देखनेके लिये उन महात्माके पीछे चल दिये ॥ २१ ॥ ततोऽभ्यगच्छन् सहिताः समुद्रं भीमनिःस्वनम् । नृत्यन्तमिव चोर्मीभिर्वल्गन्तमिव वायुना ॥ २२ ॥