भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 747

एवमुक्तस्तु विप्रेन्द्रो धर्मराज्ञा महात्मना । कथयामास माहात्म्यं सगरस्य महात्मनः ॥ ६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महात्मा धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर विप्रवर लोमशने महात्मा राजा सगरका माहात्म्य बतलाया ।। ६ ।।

लोमश उवाच

इक्ष्वाकूणां कुले जातः सगरो नाम पार्थिवः । रूपसत्त्वबलोपेतः स चापुत्रः प्रतापवान् ॥ ७ ॥ **लोमशजी कहते हैं—**राजन्! इक्ष्वाकुवंशमें सगर नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे रूप, धैर्य और बलसे सम्पन्न तथा बड़े प्रतापी थे, परंतु उनके कोई पुत्र न था ।। ७ ।।

स हैहयान् समुत्साद्य तालजङ्घांश्च भारत । वशे च कृत्वा राजन्यान् स्वराज्यमन्वशासत ॥ ८ ॥ भारत! उन्होंने हैहय तथा तालजंघ नामक क्षत्रियोंका संहार करके सब राजाओंको अपने वशमें कर लिया और अपने राज्यका शासन करने लगे ।। ८ ।।

तस्य भार्ये त्वभवतां रूपयौवनदर्पिते । वैदर्भी भरतश्रेष्ठ शैब्या च भरतर्षभ ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! राजा सगरके दो पत्नियाँ थीं, वैदर्भी और शैब्या। उन दोनोंको ही अपने रूप और यौवनका बड़ा अभिमान था ।। ९ ।।

स पुत्रकामो नृपतिस्तप्यते स्म महत्तपः । पत्नीभ्यां सह राजेन्द्र कैलासं गिरिमाश्रितः ॥ १० ॥ स तप्यमानः सुमहत् तपो योगसमन्वितः । आससाद महात्मानं त्र्यक्षं त्रिपुरमर्दनम् ॥ ११ ॥ शंकरं भवमीशानं शूलपाणिं पिनाकिनम् । त्र्यम्बकं शिवमुग्रेशं बहुरूपमुमापतिम् ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! राजा सगर अपनी दोनों पत्नियोंके साथ कैलास पर्वतपर जाकर पुत्रकी इच्छासे बड़ी भारी तपस्या करने लगे। योगयुक्त होकर महान् तपमें लगे हुए महाराज सगरको त्रिपुरनाशक, त्रिनेत्रधारी, शंकर, भव, ईशान, शूलपाणि, पिनाकी, त्र्यम्बक, उग्रेश, बहुरूप और उमापति आदि नामोंसे प्रसिद्ध महात्मा भगवान् शिवका दर्शन हुआ ।। १०—१२ ।।

स तं दृष्ट्वैव वरदं पत्नीभ्यां सहितो नृपः । प्रणिपत्य महाबाहुः पुत्रार्थे समयाचत ॥ १३ ॥ तं प्रीतिमान् हरः प्राह सभार्यं नृपसत्तमम् । यस्मिन् वृत्तो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम् ॥ १४ ॥