महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतस्य ते मनुजश्रेष्ठ भार्ये कमललोचने ।। १८ ।। वैदर्भी चैव शैब्या च गर्भिण्यौ सम्बभूवतुः । ततः कालेन वैदर्भी गर्भालाबुं व्यजायत ।। १९ ।। शैब्या च सुषुवे पुत्रं कुमारं देवरूपिणम् । तदालाबुं समुत्स्रष्टुं मनश्चक्रे स पार्थिवः ।। २० ।। ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्धान हो गये। राजा सगर भी अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो पत्नियोंसहित अपने निवासस्थानको चले गये। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर उनकी वे दोनों कमलनयनी पत्नियाँ वैदर्भी और शैब्या गर्भवती हुईं। फिर समय आनेपर वैदर्भीने अपने गर्भसे एक तूँबी उत्पन्न की और शैब्याने देवताके समान सुन्दर रूपवाले एक पुत्रको जन्म दिया। राजा सगरने उस तूंबीको फेंक देनेका विचार किया ।। १७—२० ।।
अथान्तरिक्षाच्छुश्राव वाचं गम्भीरनिःस्वनाम् । राजन् मा साहसं कार्षीः पुत्रान् न त्यक्तुमर्हसि ।। २१ ।। अलाबुमध्यान्निष्कृष्य बीजं यत्नेन गोप्यताम् । सोपस्वेदेषु पात्रेषु घृतपूर्णेषु भागशः ।। २२ ।। इसी समय आकाशसे एक गम्भीर वाणी सुनायी दी—'राजन्! ऐसा दुःसाहस न करो। अपने इन पुत्रोंका त्याग करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। इस तूँबीमें से एक-एक बीजको निकालकर घीसे भरे हुए गरम घड़ोंमें अलग-अलग रक्खो और यत्नपूर्वक इन सबकी रक्षा करो ।। २१-२२ ।।
ततः पुत्रसहस्राणि षष्टिं प्राप्स्यसि पार्थिव । महादेवेन दिष्टं ते पुत्रजन्म नराधिप । अनेन क्रमयोगेन मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ।। २३ ।। 'पृथ्वीपते! ऐसा करनेसे तुम्हें साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे। नरश्रेष्ठ! महादेवजीने तुम्हारे लिये इसी क्रमसे पुत्रजन्म होनेका निर्देश किया है; अतः तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ।। २३ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सगरसंततिकथने षडधिकशततमोऽध्यायः ।। १०६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसङ्गमें सगरसंततिवर्णनविषयक एक सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०६ ।।