महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 752, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहा—'तुम सब लोग समुद्र, वन और द्वीपोंसहित सारी पृथ्वीपर विचरते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें जाकर उस अश्वका पता लगाओ'।। १२—१४।। ततस्ते पितुराज्ञाय दिक्षु सर्वासु तं हयम्। अमार्गन्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम्॥ १५॥ ततस्ते सागराः सर्वे समुपेत्य परस्परम्। नाध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च॥ १६॥ महाराज! तदनन्तर वे पिताकी आज्ञा ले इस सम्पूर्ण भूतलमें सभी दिशाओंमें अश्वकी खोज करने लगे। खोजते-खोजते सभी सगरपुत्र एक-दूसरेसे मिले, परंतु वे अश्व तथा अश्वहर्ताका पता न लगा सके।। १५-१६।। आगम्य पितरं चोचुस्ततः प्राञ्जलयोऽग्रतः। ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा॥ १७॥ सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप। अस्माभिर्विचिता राजञ्छासनात् तव पार्थिव॥ १८॥ न चाश्वमधिगच्छामो नाश्वहर्तारमेव च। श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूर्च्छितः॥ १९॥ उवाच वचनं सर्वांस्तदा दैववशान्नृप। अनागमाय गच्छध्वं भूयो मार्गत वाजिनम्॥ २०॥ यज्ञियं तं विना ह्यश्वं नागन्तव्यं हि पुत्रकाः। प्रतिगृह्य तु संदेशं पितुस्ते सगरात्मजाः॥ २१॥ भूय एव महीं कृत्स्नां विचेतुमुपचक्रमुः। अथापश्यन्त ते वीराः पृथिवीमवदारिताम्॥ २२॥ तब वे पिताके पास आकर उनके आगे हाथ जोड़कर बोले—'महाराज! हमने आपकी आज्ञासे समुद्र, वन, द्वीप, नदी, नद, कन्दरा, पर्वत और वन्य प्रदेशोंसहित सारी पृथ्वी खोज डाली, परंतु हमें न तो अश्व मिला न उसका चुरानेवाला ही।' युधिष्ठिर! उनकी यह बात सुनकर राजा सगर क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और उस समय दैववश उन सबसे इस प्रकार बोले—'जाओ, लौटकर न आना। पुनः घोड़ेका पता लगाओ। पुत्रो! उस यज्ञके अश्वको लिये बिना वापस न आना।' पिताका वह संदेश शिरोधार्य करके सगरपुत्रोंने फिर सारी पृथ्वीपर अश्वको ढूँढ़ना आरम्भ किया। तदनन्तर उन वीरोंने एक स्थानपर पृथ्वीमें दरार पड़ी हुई देखी।। १७—२२।। समासाद्य बिलं तच्चाप्यखनन् सगरात्मजाः। कुद्दालैर्हेषुकैश्चैव समुद्रं यत्नमास्थिताः॥ २३॥ उस बिलके पास पहुँचकर सगरपुत्रोंने कुदालों और फावड़ोंसे समुद्रको प्रयत्नपूर्वक खोदना आरम्भ किया।।