महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 757, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुहूर्तं विमना भूत्वा सचिवानिदमब्रवीत् । असमञ्जाः पुरादद्य सुतो मे विप्रवास्यताम् ॥ ४३ ॥ ‘अतः असमंजसके घोर भयसे आप हमारी रक्षा करें!’ पुरवासियोंका यह भयंकर वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सगर दो घड़ीतक अनमने होकर बैठे रहे। फिर मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले—‘आज मेरे पुत्र असमंजसको मेरे घरसे बाहर निकाल दो’ ॥ ४२-४३ ॥
यदि वो मत्प्रियं कार्यमेतच्छीघ्रं विधीयताम् । एवमुक्ता नरेन्द्रेण सचिवास्ते नराधिप ॥ ४४ ॥ यथोक्तं त्वरिताश्चक्रुर्यथाऽऽज्ञापितवान् नृपः । एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा पुत्रो महात्मना ॥ ४५ ॥ पौराणां हितकामेन सगरेण विवासितः । अंशुमांस्तु महेष्वासो यदुक्तः सगरेण हि । तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ४६ ॥ ‘यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है तो मेरी इस आज्ञाका शीघ्र पालन होना चाहिये।’ राजन्! महाराज सगरके ऐसा कहनेपर मन्त्रियोंने शीघ्र वैसा ही किया, जैसा उनका आदेश था। युधिष्ठिर! पुरवासियोंके हित चाहनेवाले महात्मा सगरने जिस प्रकार अपने पुत्रको निर्वासित किया था, वह सब प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया। अब महाधनुर्धर अंशुमान्से राजा सगरने जो कुछ कहा, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, मेरे मुखसे सुनो ॥ ४४—४६ ॥
सगर उवाच
पितुश्च तेऽहं त्यागेन पुत्राणां निधनेन च । अलाभेन तथाश्वस्य परितप्यामि पुत्रक ॥ ४७ ॥ **सगर बोले—**बेटा! तुम्हारे पिताको त्याग देनेसे, अन्य पुत्रोंकी मृत्यु हो जानेसे तथा यज्ञसम्बन्धी अश्वके न मिलनेसे मैं सर्वथा संतप्त हो रहा हूँ ॥ ४७ ॥
तस्माद् दुःखाभिसंतप्तं यज्ञविघ्नाच्च मोहितम् । हयस्यानयनात् पौत्र नरकान्मां समुद्धर ॥ ४८ ॥ अतः पौत्र! यज्ञमें विघ्न पड़ जानेसे मैं मोहित और दुःखसे संतप्त हूँ। तुम अश्वको ले आकर नरकसे मेरा उद्धार करो ॥ ४८ ॥
अंशुमानेवमुक्तस्तु सगरेण महात्मना । जगाम दुःखार्त् तं देशं यत्र वै दारिता मही ॥ ४९ ॥ महात्मा सगरके ऐसा कहनेपर अंशुमान् बड़े दुःखसे उस स्थानपर गये जहाँ पृथ्वी विदीर्ण की गयी थी ॥ ४९ ॥
स तु तेनैव मार्गेण समुद्रं प्रविवेश ह । अपश्यच्च महात्मानं कपिलं तुरगं च तम् ॥ ५० ॥