महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 759, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वया कृतार्थः सगरः पुत्रवांश्च त्वया पिता ॥ ५५ ॥ तब मुनिश्रेष्ठ महातेजस्वी कपिलने अंशुमान्से कहा—'अनघ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जो कुछ माँगते हो वह सब तुम्हें दूँगा। तुममें क्षमा, धर्म और सत्य सब कुछ प्रतिष्ठित है। तुम-जैसे पौत्रको पाकर राजा सगर कृतार्थ हैं और तुम्हारे पिता तुम्हींसे वस्तुतः पुत्रवान् हैं ॥ ५४-५५ ॥
तव चैव प्रभावेण स्वर्गं यास्यन्ति सागराः । (शलभत्वं गता ह्येते मम क्रोधहुताशने ।) पौत्रश्च ते त्रिपथगां त्रिदिवादानयिष्यति ॥ ५६ ॥ पावनार्थं सागराणां तोषयित्वा महेश्वरम् । हयं नयस्व भद्रं ते यज्ञियं नरपुङ्गव ॥ ५७ ॥ 'तुम्हारे ही प्रभावसे सगरके सारे पुत्र जो मेरी क्रोधाग्निमें शलभकी भाँति भस्म हो गये हैं, स्वर्गलोकमें चले जायँगे। तुम्हारा पौत्र भगवान् शंकरको संतुष्ट करके सगरपुत्रोंको पवित्र करनेके लिये स्वर्गलोकसे यहाँ गंगाजीको ले आयेगा। नरश्रेष्ठ! तुम्हारा भला हो। तुम इस यज्ञिय अश्वको ले जाओ ॥ ५६-५७ ॥
यज्ञः समाप्यतां तात सगरस्य महात्मनः । अंशुमानेवमुक्तस्तु कपिलेन महात्मना ॥ ५८ ॥ आजगाम हयं गृह्य यज्ञवाटं महात्मनः । सोऽभिवाद्य ततः पादौ सगरस्य महात्मनः ॥ ५९ ॥ मूर्ध्नि तेनाप्युपाघ्रातस्तस्मै सर्वं न्यवेदयत् । यथा दृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षयं तथा ॥ ६० ॥ तं चास्मै हयमाचष्ट यज्ञवाटमुपागतम् । तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दुःखमत्यजत् ॥ ६१ ॥ 'तात! महात्मा सगरका यज्ञ पूर्ण करो।' महात्मा कपिलके ऐसा कहनेपर अंशुमान् उस अश्वको लेकर महामना सगरके यज्ञमण्डपमें आये और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उनसे सब समाचार निवेदन किया। सगरने भी स्नेहसे अंशुमान्का मस्तक सूँघा। अंशुमान्ने सगर-पुत्रोंका विनाश जैसा देखा और सुना था, वह सब बताया, साथ ही यह भी कहा कि 'यज्ञिय अश्व यज्ञमण्डपमें आ गया है।' यह सुनकर राजा सगरने पुत्रोंके मरनेका दुःख त्याग दिया ॥ ५८—६१ ॥
अंशुमन्तं च सम्पूज्य समापयत तं क्रतुम् । समाप्तयज्ञः सगरो देवैः सर्वैः सभाजितः ॥ ६२ ॥ और अंशुमान्की प्रशंसा करते हुए अपने उस यज्ञको पूर्ण किया। यज्ञ पूर्ण हो जानेपर सब देवताओंने सगरका बड़ा सत्कार किया ॥ ६२ ॥
पुत्रत्वे कल्पयामास समुद्रं वरुणालयम् ।