महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 76, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएतद् वाक्यं विदुर यत् ते सभाया- मिह प्रोक्तं पाण्डवान् प्राप्य मां च । हितं तेषामहितं मामकाना- मेतत् सर्वं मम नैवैति चेतः ॥ १८ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—विदुर! तुमने यहाँ सभामें पाण्डवोंके तथा मेरे विषयमें जो बात कही है वह पाण्डवोंके लिये तो हितकर है, पर मेरे पुत्रोंके लिये अहितकारक है, अतः यह सब मेरा मन स्वीकार नहीं करता है ॥ १८ ॥
इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ । तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम् ॥ १९ ॥
इस समय तुम जो कुछ कह रहे हो इससे यह भलीभाँति निश्चय होता है कि तुम पाण्डवोंके हितके लिये ही यहाँ आये थे। तुम्हारे आजके ही व्यवहारसे मैं समझ गया कि तुम मेरे हितैषी नहीं हो। मैं पाण्डवोंके लिये अपने पुत्रोंको कैसे त्याग दूँ ॥ १९ ॥
असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात् प्रसूतः । स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को नु ब्रूयात् समतामन्ववेक्ष्य ॥ २० ॥
इसमें संदेह नहीं कि पाण्डव भी मेरे पुत्र हैं, पर दुर्योधन साक्षात् मेरे शरीरसे उत्पन्न हुआ है। समताकी ओर दृष्टि रखते हुए भी कौन किसको ऐसी बातें कहेगा कि तुम दूसरेके हितके लिये अपने शरीरका त्याग कर दो ॥ २० ॥
स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि । यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति ॥ २१ ॥
विदुर! मैं तुम्हारा अधिक सम्मान करता हूँ; किंतु तुम मुझे सब कुटिलतापूर्ण सलाह दे रहे हो। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, चले जाओ या रहो। तुमसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। कुलटा स्त्रीको कितनी ही सान्त्वना दी जाय, वह स्वामीको त्याग ही देती है ॥ २१ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्य- दन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन् । नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः