भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 764

गंगाजीने कहा—महाराज! तुम मुझसे क्या चाहते हो, मैं तुम्हें क्या दूँ? नरश्रेष्ठ! बताओ, मैं तुम्हारी याचना पूर्ण करूँगी ॥ १५ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच राजा हैमवतीं तदा । (नदीं भगीरथो राजन् प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।) पितामहा मे वरदे कपिलेन महानदि ॥ १६ ॥ अन्वेषमाणास्तुरगं नीता वैवस्वतक्षयम् । षष्टिस्तानि सहस्राणि सागराणां महात्मनाम् ॥ १७ ॥ कपिलं देवमासाद्य क्षणेन निधनं गताः । तेषामेवं विनष्टानां स्वर्गे वासो न विद्यते ॥ १८ ॥ यावत् तानि शरीराणि त्वं जलैर्नाभिषिञ्चसि । तावत् तेषां गतिर्नास्ति सागराणां महानदि ॥ १९ ॥ स्वर्गं नय महाभागे मत्पितॄन् सगरात्मजान् । तेषामर्थेन याचामि त्वामहं वै महानदि ॥ २० ॥

राजन्! उनके ऐसा कहनेपर राजा भगीरथने हिमालयनन्दिनी गंगाको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—‘वरदायिनी महानदी! मेरे पितामह यज्ञसम्बन्धी अश्वका पता लगाते हुए कपिलके कोपसे यमलोकको जा पहुँचे हैं। वे सब महात्मा सगरके पुत्र थे और उनकी संख्या साठ हजार थी। भगवान् कपिलके निकट जाकर वे सब-के-सब क्षणभरमें भस्म हो गये। इस प्रकार दुर्मृत्युसे मरनेके कारण उन्हें स्वर्गमें निवास नहीं प्राप्त हुआ है। महानदी! जबतक तुम अपने जलसे उनके भस्म हुए शरीरोंको सींच न दोगी तबतक उन सगरपुत्रोंकी सद्गति नहीं हो सकती। महाभागे! मेरे पितामह सगरकुमारोंको स्वर्गमें पहुँचा दो। महानदी! मैं उन्हींके उद्धारके लिये तुमसे याचना करता हूँ’ ॥ १६—२० ॥

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