महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयाद करने लगते थे। इस प्रकार बहुत-सी अद्भुत बातें देखकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने लोमशजीसे पुनः इस अद्भुत अवस्थाके विषयमें पूछा ।।
(युधिष्ठिर उवाच
यदेतद् भगवंश्चित्रं पर्वतेऽस्मिन् महौजसि ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महाद्युते ॥)
युधिष्ठिरने कहा—महातेजस्वी भगवन्! इस परम तेजोमय पर्वतपर जो ये आश्चर्यजनक बातें होती हैं, इसका क्या रहस्य है? यह सब विस्तारपूर्वक मुझे बताइये।
लोमश उवाच
यथाश्रुतमिदं पूर्वमस्माभिररिकर्शन ।
तदेकाग्रमना राजन् निबोध गदतो मम ॥ ७ ॥
तब लोमशजीने कहा—शत्रुसूदन! हमने पूर्वकालमें जैसा सुन रखा है वैसा बताया जाता है। तुम एकाग्रचित्त हो मेरे मुखसे इसका रहस्य सुनो ॥ ७ ॥
अस्मिन्नृषभकूटेऽभूदृषभो नाम तापसः ।
अनेकशतवर्षायुस्तपस्वी कोपनो भृशम् ॥ ८ ॥
पहलेकी बात है, इस ऋषभकूटपर ऋषभनामसे प्रसिद्ध एक तपस्वी रहते थे। उनकी आयु कई सौ वर्षोंकी थी। वे तपस्वी होनेके साथ ही बड़े क्रोधी थे ॥ ८ ॥
स वै सम्भाष्यमाणोऽन्यैः कोपाद् गिरमुवाच ह ।
य इह व्याहरेत् कश्चिदुपलानुत्सृजेस्तथा ॥ ९ ॥
वातं चाहूय मा शब्दमित्युवाच स तापसः ।
व्याहरंश्चेह पुरुषो मेघशब्देन वार्यते ॥ १० ॥
एवमेतानि कर्माणि राजंस्तेन महर्षिणा ।
कृतानि कानिचित् क्रोधात् प्रतिषिद्धानि कानिचित् ॥ ११ ॥
उन्होंने दूसरोंके बुलानेपर कुपित होकर उस पर्वतसे कहा—'जो कोई यहाँपर बातचीत करे उसपर तू ओले बरसा।' इसी प्रकार वायुको भी बुलाकर उन तपस्वी मुनिने कहा—'देखो, यहाँ किसी प्रकारका शब्द नहीं होना चाहिये।' तबसे जो कोई पुरुष यहाँ बोलता है उसे मेघकी गर्जनाद्वारा रोका जाता है। राजन्! इस प्रकार उन महर्षिने ही ये अद्भुत कार्य किये हैं। उन्होंने क्रोधवश कुछ कार्योंका विधान और कुछ बातोंका निषेध कर दिया है ॥ ९—११ ॥
नन्दां त्वभिगता देवाः पुरा राजन्निति श्रुतिः ।
अन्वपद्यन्त सहसा पुरुषा देवदर्शिनः ॥ १२ ॥
राजन्! यह सुना जाता है कि प्राचीन कालमें देवतालोग नन्दाके तटपर आये थे, उस समय उनके दर्शनकी इच्छासे बहुतेरे मनुष्य सहसा वहाँ आ पहुँचे ॥ १२ ॥