महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 773, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंततस्तत्र समाप्लुत्य गात्राणि सगणो नृपः । जगाम कौशिकीं पुण्यां रम्यां शीतजलां शुभाम् ॥ २१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**तदनन्तर राजा युधिष्ठिर अपने दल-बलके साथ नन्दामें गोता लगाकर रमणीय एवं शीतल जलवाली शुभ पुण्यमयी कौशिकीके तटपर गये ॥
लोमश उवाच
एषा देवनदी पुण्या कौशिकी भरतर्षभ । विश्वामित्राश्रमो रम्य एष चात्र प्रकाशते ॥ २२ ॥ **वहाँ लोमशजीने कहा—**भरतश्रेष्ठ! यह देवताओंकी नदी पुण्यसलिला कौशिकी है और यह विश्वामित्रका रमणीय आश्रम है, जो यहाँ प्रकाशित हो रहा है ॥ २२ ॥
आश्रमश्चैव पुण्याख्यः काश्यपस्य महात्मनः । ऋष्यशृङ्गः सुतो यस्य तपस्वी संयतेन्द्रियः ॥ २३ ॥ तपसो यः प्रभावेण वर्षयामास वासवम् । अनावृष्ट्यां भयाद् यस्य ववर्ष बलवृत्रहा ॥ २४ ॥ यहीं कश्यपगोत्रीय महात्मा विभाण्डकका ‘पुण्य’ नामक आश्रम है। इन्हींके तपस्वी एवं जितेन्द्रिय पुत्र महात्मा ऋष्यशृंग हैं, जिन्होंने अपनी तपस्याके प्रभावसे इन्द्रद्वारा वर्षा करवायी थी। उन दिनों देशमें घोर अनावृष्टि फैल रही थी, वैसे समयमें ऋष्यशृंग मुनिके भयसे बल और वृत्रासुरके विनाशक देवराज इन्द्रने उस देशमें वर्षा की थी ॥ २३-२४ ॥
मृग्यां जातः स तेजस्वी काश्यपस्य सुतः प्रभुः । विषये लोमपादस्य यश्चकाराद्भुतं महत् ॥ २५ ॥ वे तेजस्वी एवं शक्तिशाली मुनि मृगीके पेटसे पैदा हुए थे और कश्यपनन्दन विभाण्डकके पुत्र थे। उन्होंने राजा लोमपादके राज्यमें अत्यन्त अद्भुत कार्य किया था ॥ २५ ॥
निर्वर्तितेषु सस्येषु यस्मै शान्तां ददौ नृपः । लोमपादो दुहितरं सावित्रीं सविता यथा ॥ २६ ॥ जब वर्षासे खेती अच्छी तरह लहलहा उठी तब राजा लोमपादने अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंगको ब्याह दी; ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यदेवने अपनी बेटी सावित्रीका ब्रह्माजीके साथ ब्याह किया था ॥ २६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ऋष्यशृङ्गः कथं मृग्यामुत्पन्नः काश्यपात्मजः । विरुद्धे योनिसंसर्गे कथं च तपसा युतः ॥ २७ ॥ किमर्थं च भयाच्छक्रस्तस्य बालस्य धीमतः । अनावृष्ट्यां प्रवृत्तायां ववर्ष बलवृत्रहा ॥ २८ ॥