महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवह भी कार्यसाधनमें कुशल थी। उसने वहाँ जाकर निरन्तर तपस्यामें लगे रहनेवाले ऋषिकुमार ऋष्यशृंगके समीप उस आश्रममें पहुँचकर उनको देखा ॥ ६ ॥
वेश्योवाच
कच्चिन्मुने कुशलं तापसानां कच्चिच्च वो मूलफलं प्रभूतम् । कच्चिद् भवान् रमते चाश्रमेऽस्मिं- स्त्वां वै द्रष्टुं साम्प्रतमागतोऽस्मि ॥ ७ ॥ ‘तत्पश्चात्' वेश्याने कहा—मुने! तपस्वीलोग कुशलसे तो हैं न? आपलोगोंको पर्याप्त फल-मूल तो मिल जाते हैं न? आप इस आश्रममें प्रसन्न तो हैं न? मैं इस समय आपके दर्शनके लिये ही यहाँ आयी हूँ ॥ ७ ॥
कच्चित् तपो वर्धते तापसानां पिता च ते कच्चिदहीनतेजाः । कच्चित् त्वया प्रीयते चैव विप्र कच्चित् स्वाध्यायः क्रियते चर्ष्यशृङ्ग ॥ ८ ॥ क्या तपस्वीलोगोंकी तपस्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है? आपके पिताका तेज क्षीण तो नहीं हो रहा है? ब्रह्मन्! आप मजेमें हैं न? ऋष्यशृंगजी! आपके स्वाध्यायका क्रम चल रहा है न? ॥ ८ ॥
ऋष्यशृङ्ग उवाच
ऋद्ध्या भवाञ्ज्योतिरिव प्रकाशते मन्ये चाहं त्वामभिवादनीयम् । पाद्यं वै ते सम्प्रदास्यामि कामाद् यथाधर्मं फलमूलानि चैव ॥ ९ ॥ ऋष्यशृंग बोले—ब्रह्मन्! आप अपनी समृद्धिसे ज्योतिकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। मैं आपको अपने लिये वन्दनीय मानता हूँ और स्वेच्छासे धर्मके अनुसार आपके लिये पाद्य-अर्घ्य एवं फल-मूल अर्पण करता हूँ ॥ ९ ॥
कौश्यां बृष्यामास्स्व यथोपजोषं कृष्णाजिनेनावृतायां सुखायाम् । क्व चाश्रमस्तव किं नाम चेदं व्रतं ब्रह्मंश्चरसि हि देववत् त्वम् ॥ १० ॥ इस कुशासनपर आप सुखपूर्वक बैठें। इसपर काला मृगचर्म बिछाया गया है, इसलिये इसपर बैठनेमें आराम रहेगा। आपका आश्रम कहाँ है? और आपका नाम क्या है? ब्रह्मन्! आप देवताके समान यह किस व्रतका आचरण कर रहे हैं? ॥ १० ॥