भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 786, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 786

हिरण्मयी मेखला मे यथेयम् ॥ ४ ॥ उस ब्रह्मचारीके नाभिदेशके समीप जो शरीरका मध्य भाग था, वह बहुत पतला था और उसका नितम्बभाग अत्यन्त स्थूल था। जैसे मेरे कौपीनके नीचे यह मूँजकी मेखला बँधी है, इसी प्रकार उसके कटि-प्रदेशमें भी एक सोनेकी मेखला (करधनी) थी, जो उसके चीरके भीतरसे चमकती रहती थी ॥ ४ ॥

अन्यच्च तस्याद्भुतदर्शनीयं विकूजितं पादयोः सम्प्रभाति । पाण्योश्च तद्वत् स्वनवन्निबद्धौ कलापकावक्षमाला यथेयम् ॥ ५ ॥ उसकी अन्य सब बातें भी अद्भुत एवं दर्शनीय थीं। पैरोंमें (पायलकी) छम-छम ध्वनि बड़ी मधुर प्रतीत होती थी। इसी प्रकार हाथोंकी कलाइयोंमें मेरी इस रुद्राक्षकी मालाकी भाँति उसने दो कलापक (कंगन) बाँध रखे थे, उनसे भी बड़ी मधुर ध्वनि होती रहती थी ॥ ५ ॥

विचेष्टमानस्य च तस्य तानि कूजन्ति हंसाः सरसीव मत्ताः । चीराणि तस्याद्भुतदर्शनानि नेमानि तद्वन्मम रूपवन्ति ॥ ६ ॥ वह ब्रह्मचारी जब तनिक भी चलता-फिरता या हिलता-डुलता था, उस समय उसके आभूषण बड़ी मनोहर झनकार उत्पन्न करते थे, मानो सरोवरमें मतवाले हंस कलरव कर रहे हों। उसके चीर भी अद्भुत दिखायी देते थे। मेरी कौपीनके ये वल्कलवस्त्र वैसे सुन्दर नहीं हैं ॥ ६ ॥

वक्त्रं च तस्याद्भुतदर्शनीयं प्रव्याहृतं ह्लादयतीव चेतः । पुंस्कोकिलस्येव च तस्य वाणी तां शृण्वतो मे व्यथितोऽन्तरात्मा ॥ ७ ॥ उसका मुख भी देखने ही योग्य था। उसकी अद्भुत शोभा थी। ब्रह्मचारीकी एक-एक बात मनको आनन्द-सिन्धुमें निमग्न-सा कर देती थी। उसकी वाणी कोकिलके समान थी, जिसे एक बार सुन लेनेपर अब पुनः सुननेके लिये मेरी अन्तरात्मा व्यथित हो उठी है ॥ ७ ॥

यथा वनं माधवमासि मध्ये समीरितं श्वसनेनेव भाति । तथा स भात्युत्तमपुण्यगन्धी निषेव्यमाणः पवनेन तात ॥ ८ ॥

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