महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंततोऽपश्यद् विदुरं तूर्णमारा- दभ्यायान्तं सत्यसंधः स राजा । अथाब्रवीद् भ्रातरं भीमसेनं किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य ॥ ७ ॥ सत्यप्रतिज्ञ राजा युधिष्ठिरने जब बड़ी उतावलीके साथ विदुरजीको अपने निकट आते देखा तब भाई भीमसेनसे कहा—'ये विदुरजी हमारे पास आकर न जाने क्या कहेंगे ॥ ७ ॥
कच्चिन्नायं वचनात् सौबलस्य समाह्वाता देवनायोपयातः । कच्चित् क्षुद्रः शकुनिर्नायुधानि जेष्यत्यस्मान् पुनरेवाक्षवत्याम् ॥ ८ ॥ 'ये शकुनिके कहनेसे हमें फिर जूआ खेलनेके लिये बुलाने तो नहीं आ रहे हैं। कहीं नीच शकुनि हमें फिर द्यूत-सभामें बुलाकर हमारे आयुधोंको तो जीत नहीं लेगा ॥ ८ ॥
समाहूतः केनचिदाद्रवेति नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम् । गाण्डीवे च संशयिते कथं नु राज्यप्राप्तिः संशयिता भवेन्नः ॥ ९ ॥ 'भीमसेन! आओ, कहकर यदि कोई मुझे (युद्ध या द्यूतके लिये) बुलावे तो मैं पीछे नहीं हट सकता। ऐसी दशामें यदि हम गाण्डीव धनुष किसी तरह जूएमं हार गये तो हमारी राज्य-प्राप्ति संशयमें पड़ जायगी' ॥ ९ ॥
वैशम्पायन उवाच
तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेयाः प्रत्यगृह्णन् नृपते सर्व एव । तैः सत्कृतः स च तानाजमीढो यथोचितं पाण्डुपुत्रान् समेयात् ॥ १० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर सब पाण्डवोंने उठकर विदुरजीकी अगवानी की। उनके द्वारा किया हुआ यथोचित स्वागत-सत्कार ग्रहण करके अजमीढवंशी विदुर पाण्डवोंसे मिले ॥ १० ॥
समाश्र्वस्तं विदुरं ते नरर्षभा- स्ततोऽपृच्छन्नागमनाय हेतुम् ।