भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 791

स्मृतानि चित्रोज्ज्वलगन्धवन्ति ॥ ४ ॥ वत्स! जिसे तुम जल समझते थे, वह मद्य था। वह पापजनक और अपेय है, उसे कभी नहीं पीना चाहिये। दुष्ट पुरुष उसका उपयोग करते हैं तथा ये विचित्र, उज्ज्वल और सुगन्धित पुष्पमालाएँ भी मुनियोंके योग्य नहीं बतायी गयी हैं ॥ ४ ॥ रक्षांसि तानीति निवार्य पुत्रं विभाण्डकस्तां मृगयाम्बभूव । नासादयामास यदा त्र्यहेण तदा स पर्याववृतेऽऽश्रमाय ॥ ५ ॥ 'ऐसी वस्तुएँ लानेवाले राक्षस ही हैं।' ऐसा कहकर विभाण्डक मुनिने पुत्रको उससे मिलने-जुलनेसे मना कर दिया और स्वयं उस वेश्याकी खोज करने लगे। तीन दिनोंतक ढूँढ़नेपर भी जब वे उसका पता न लगा सके, तब आश्रमपर लौट आये ॥ ५ ॥ यदा पुनः काश्यपो वै जगाम फलान्याहर्तुं विधिनाऽऽश्रमात् सः । तदा पुनर्लोभयितुं जगाम सा वेशयोषा मुनिमृष्यशृङ्गम् ॥ ६ ॥ जब काश्यपनन्दन विभाण्डक मुनि आश्रमसे पुनः विधिके अनुसार फल लानेके लिये वनमें गये, तब वह वेश्या ऋष्यशृंग मुनिको लुभानेके लिये फिर उनके आश्रमपर आयी ॥ ६ ॥ दृष्ट्वैव तामृष्यशृङ्गः प्रहृष्टः सम्भ्रान्तरूपोऽभ्यपतत् तदानीम् । प्रोवाच चैनां भवतः श्रमाय गच्छाव यावन्न पिता ममैति ॥ ७ ॥ उसे देखते ही ऋष्यशृंग मुनि हर्ष-विभोर हो उठे और घबराकर तुरंत उसके पास दौड़ गये। निकट जाकर उन्होंने कहा—'ब्रह्मन्! मेरे पिताजी जबतक लौटकर नहीं आते, तभीतक मैं और आप—दोनों आपके आश्रमकी ओर चल दें' ॥ ७ ॥ ततो राजन् काश्यपस्यैकपुत्रं प्रवेश्य योगेन विमुच्य नावम् । प्रमोदयन्त्यो विविधैरुपायै- राजग्मुरङ्गाधिपतेः समीपम् ॥ ८ ॥ राजन्! तदनन्तर विभाण्डक मुनिके इकलौते पुत्रको युक्तिसे नावमें ले जाकर वेश्याने नाव खोल दी। फिर सभी युवतियाँ भाँति-भाँतिके उपायोंद्वारा उनका मनोरंजन करती हुई अंगराजके समीप आयीं ॥ ८ ॥ संस्थाप्य तामाश्रमदर्शने तु