भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 795

अपने पुत्रके अधिकारमें आये हुए ग्राम, घोष और बहू शान्ताको देखकर उनका महान्

कोप शान्त हो गया। युधिष्ठिर! उस समय विभाण्डक मुनिने राजा लोमपादपर बड़ी कृपा

की ॥ २० ॥

स तत्र निक्षिप्य सुतं महर्षि-

रुवाच सूर्याग्निसमप्रभावः ।

जाते च पुत्रे वनमेवाव्रजेथा

राज्ञः प्रियाण्यस्य सर्वाणि कृत्वा ॥ २१ ॥

सूर्य और अग्निके समान प्रभावशाली महर्षिने अपने पुत्रको वहीं छोड़ दिया और कहा

—'बेटा! पुत्र उत्पन्न हो जानेपर इन अंगराजके सारे प्रिय कार्य सिद्ध करके फिर वनमें ही

आ जाना' ॥ २१ ॥

स तद्वचः कृतवानृष्यशृङ्गो

ययौ च यत्रास्य पिता बभूव ।

शान्ता चैनं पर्यचरन्नरेन्द्र

खे रोहिणी सोममिवानुकूला ॥ २२ ॥

ऋष्यशृंगने पिताकी आज्ञाका अक्षरशः पालन किया। अन्तमें वे पुनः उसी आश्रममें

चले गये जहाँ उनके पिता रहते थे। नरेन्द्र! शान्ता उसी प्रकार अनुकूल रहकर उनकी सेवा

करती थी जैसे आकाशमें रोहिणी चन्द्रमाकी सेवा करती है ॥ २२ ॥

अरुन्धती वा सुभगा वसिष्ठं

लोपामुद्रा वा यथा ह्यगस्त्यम् ।

नलस्य वै दमयन्ती यथाभूद्

यथा शची वज्रधरस्य चैव ॥ २३ ॥

अथवा जैसे सौभाग्यशालिनी अरुन्धती वसिष्ठजीकी, लोपामुद्रा अगस्त्यजीकी,

दमयन्ती नलकी तथा शची वज्रधारी इन्द्रकी सेवा करती है ॥ २३ ॥

नारायणी चेन्द्रसेना बभूव

वश्या नित्यं मुद्गलस्याजमीढ ।

(यथा सीता दाशरथेर्महात्मनो

यथा तव द्रौपदी पाण्डुपुत्र ।)

तथा शान्ता ऋष्यशृङ्गं वनस्थं

प्रीत्या युक्ता पर्यचरन्नरेन्द्र ॥ २४ ॥

युधिष्ठिर! जैसे नारायणी इन्द्रसेना सदा महर्षि मुद्गलके अधीन रहती थी तथा

पाण्डुनन्दन! जैसे सीता महात्मा दशरथनन्दन श्रीरामके अधीन रही हैं और द्रौपदी सदा

तुम्हारे वशमें रहती आयी है, उसी प्रकार शान्ता भी सदा अधीन रहकर वनवासी

ऋष्यशृंगकी प्रसन्नतापूर्वक सेवा करती थी ॥ २४ ॥

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