भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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स्थान हो।' पाण्डुनन्दन! इस सत्य वाक्यका उच्चारण करते हुए तुम शीघ्रतापूर्वक इस वेदीपर आरूढ़ हो जाओ॥ २७॥ अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोधा विष्णोरमृतस्य नाभिः। एवं जपन् पाण्डव सत्यवाक्यं ततोऽवगाहेत पतिं नदीनाम्॥ २८॥ 'हे महासागर! अग्नि तुम्हारी योनि (कारण) है और यज्ञ शरीर है, तुम भगवान् विष्णुकी शक्तिके आधार और मोक्षके साधन हो।' पाण्डुपुत्र! इस सत्य वचनको बोलते हुए नदियोंके स्वामी समुद्रमें स्नान करना चाहिये॥ २८॥ अन्यथा हि कुरुश्रेष्ठ देवयोनिरपां पतिः। कुशाग्रेणापि कौन्तेय न स्प्रष्टव्यो महोदधिः॥ २९॥ कुरुश्रेष्ठ! जलका स्वामी समुद्र देवताओंका अधिष्ठान है। कुन्तीनन्दन! ऊपर बतायी हुई रीतिके सिवा दूसरे किसी प्रकारसे इस महासागरका कुशके अग्रभागद्वारा भी स्पर्श नहीं करना चाहिये॥ २९॥

वैशम्पायन उवाच

ततः कृतस्वस्त्ययनो महात्मा युधिष्ठिरः सागरमभ्यगच्छत्। कृत्वा च तच्छासनमस्य सर्वं महेन्द्रमासाद्य निशामुवास॥ ३०॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर लोमशजीके स्वस्तिवाचन करनेके पश्चात् महात्मा राजा युधिष्ठिरने उनकी बतायी हुई सारी विधियोंका पालन करते हुए समुद्रमें स्नान करनेके लिये प्रवेश किया। इसके बाद महेन्द्रपर्वतपर जाकर रात्रि बितायी॥ ३०॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां महेन्द्राचलगमने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११४॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें महेन्द्राचलगमनविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११४॥