महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिर उवाच
भवाननुगतो रामं जामदग्न्यं महाबलम् । प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पूर्ववृत्तस्य कर्मणः ॥ ७ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—मुने! आप महाबली परशुरामजीके अनुगत भक्त हैं। उन्होंने पहले जो-जो कार्य किये हैं, उन सबको आपने प्रत्यक्ष देखा है ॥ ७ ॥
स भवान् कथयत्वद्य यथा रामेण निर्जिताः । आहवे क्षत्रियाः सर्वे कथं केन च हेतुना ॥ ८ ॥ अतः हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि परशुरामजीने किस प्रकार और किस कारणसे समस्त क्षत्रियोंको युद्धमें पराजित किया था। आप वह सब वृत्तान्त आज मुझे बताइये ॥ ८ ॥
अकृतव्रण उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् । भृगूणां राजशार्दूल वंशे जातस्य भारत ॥ ९ ॥ अकृतव्रणने कहा—भरतकुलभूषण नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! भृगुवंशी परशुरामजीकी कथा बहुत बड़ी और उत्तम है, मैं आपसे उसका वर्णन करूँगा ॥ ९ ॥
रामस्य जामदग्न्यस्य चरितं देवसम्मितम् । हैहयाधिपतेश्चैव कार्तवीर्यस्य भारत ॥ १० ॥ भारत! जमदग्निकुमार परशुराम तथा हैहयराज कार्तवीर्यका चरित्र देवताओंके तुल्य है ॥ १० ॥
रामेण चार्जुनो नाम हैहयाधिपतिर्हतः । तस्य बाहुशतान्यासंत्रीणि सप्त च पाण्डव ॥ ११ ॥ पाण्डुनन्दन! परशुरामजीने अर्जुन नामसे प्रसिद्ध जिस हैहयराज कार्तवीर्यका वध किया था, उसके एक हजार भुजाएँ थीं ॥ ११ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन विमानं काञ्चनं तथा । ऐश्वर्यं सर्वभूतेषु पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ १२ ॥ पृथिवीपते! श्रीदत्तात्रेयजीकी कृपासे उसे एक सोनेका विमान मिला था और भूतलके सभी प्राणियोंपर उसका प्रभुत्व था ॥ १२ ॥
अव्याहतगतिश्चैव रथस्तस्य महात्मनः । रथेन तेन तु सदा वरदानेन वीर्यवान् ॥ १३ ॥ ममर्द देवान् यक्षांश्च ऋषींश्चैव समन्ततः । भूतांश्चैव स सर्वांस्तु पीडयामास सर्वतः ॥ १४ ॥