महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 811, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसा तु चित्ररथं नाम मार्तिकावतकं नृपम् । ददर्श रेणुका राजन्नागच्छन्ती यदृच्छया ॥ ६ ॥ क्रीडन्तं सलिले दृष्ट्वा सभार्यं पद्ममालिनम् । ऋद्धिमन्तं ततस्तस्य स्पृहयामास रेणुका ॥ ७ ॥ राजन्! जब वह स्नान करके लौटने लगी उस समय अकस्मात् उसकी दृष्टि मार्तिकावत देशके राजा चित्ररथपर पड़ी, जो कमलोंकी माला धारण करके अपनी पत्नीके साथ जलमें क्रीड़ा कर रहा था। उस समृद्धिशाली नरेशको उस अवस्थामें देखकर रेणुकाने उसकी इच्छा की ॥ ६-७ ॥ व्यभिचाराच्च तस्मात् सा क्लिन्नाम्भसि विचेतना । प्रविवेशाश्रमं त्रस्ता तां वै भर्तान्र्वबुध्यत ॥ ८ ॥ उस समय इस मानसिक विकारसे द्रवित हुई रेणुका जलमें बेहोश-सी हो गयी। फिर त्रस्त होकर उसने आश्रमके भीतर प्रवेश किया। परंतु पतिदेव उसकी सब बातें जान गये ॥ ८ ॥ स तां दृष्ट्वा च्युतां धैर्याद् ब्राह्मया लक्ष्म्या विवर्जिताम् । धिक्शब्देन महातेजा गर्हयामास वीर्यवान् ॥ ९ ॥ उसे धैर्यसे च्युत और ब्रह्मतेजसे वंचित हुई देख उन महातेजस्वी शक्तिशाली महर्षिने धिक्कारपूर्ण वचनोंद्वारा उसकी निन्दा की ॥ ९ ॥ ततो ज्येष्ठो जामदग्न्यो रुमण्वान् नाम नामतः । आजगाम सुषेणश्च वसुर्विश्वावसुस्तथा ॥ १० ॥ इसी समय जमदग्निके ज्येष्ठ पुत्र रुमण्वान् वहाँ आ गये। फिर क्रमशः सुषेण, वसु और विश्वावसु भी आ पहुँचे ॥ १० ॥ तानानुपूर्व्याद् भगवान् वधे मातुरचोदयत् । न च ते जातसंस्नेहाः किंचिदूचुर्विचेतसः ॥ ११ ॥ भगवान् जमदग्निने बारी-बारीसे उन सभी पुत्रोंको यह आज्ञा दी कि तुम अपनी माताका वध कर डालो, परंतु मातृस्नेह उमड़ आनेसे वे कुछ भी बोल न सके—बेहोश-से खड़े रहे ॥ ११ ॥ ततः शशाप तान् क्रोधात् ते शप्ताश्चेतनां जहुः । मृगपक्षिसधर्माणः क्षिप्रामासञ्जडोपमाः ॥ १२ ॥ तब महर्षिने कुपित हो उन सब पुत्रोंको शाप दे दिया। शापग्रस्त होनेपर वे अपनी चेतना (विचार-शक्ति) खो बैठे और तुरंत मृग एवं पक्षियोंके समान जडबुद्धि हो गये ॥ १२ ॥ ततो रामोऽभ्ययात् पश्चादाश्रमं परवीरहा । तमुवाच महाबाहुर्जमदग्निर्महातपाः ॥ १३ ॥