भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 824

स्तीर्थं प्रभासं समुपाजगाम ॥ १५ ॥ वहाँसे प्रस्थित हो वे भाइयोंसहित सागरतटवर्ती तीर्थोंके मार्गसे होते हुए फिर प्रभासक्षेत्र आये जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके कारण भूमण्डलमें अधिक प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥ तत्राभिषिक्तः पृथुलोहिताक्षः सहानुजैर्देवगणान् पितॄंश्च । संतर्पयामास तथैव कृष्णा ते चापि विप्राः सह लोमशेन ॥ १६ ॥ वहाँ भाइयोंसहित स्नान करके विशाल एवं लाल नेत्रोंवाले राजा युधिष्ठिरने देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। इसी प्रकार द्रौपदीने, साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंने तथा महर्षि लोमशने भी वहाँ स्नान एवं तर्पण किये ॥ १६ ॥ स द्वादशाहं जलवायुभक्षः कुर्वन् क्षपाहःसु तदाभिषेकम् । समन्ततोऽग्नीनुपदीपयित्वा तेपे तपो धर्मभृतां वरिष्ठः ॥ १७ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर वहाँ बारह दिनोंतक केवल जल और वायु पीकर रहते हुए दिनमें और रातमें भी स्नान करते तथा अपने चारों ओर आग जलाकर तपस्यामें लगे रहते थे ॥ १७ ॥ तमुग्रमास्थाय तपश्चरन्तं शुश्राव रामश्च जनार्दनश्च । तौ सर्ववृष्णिप्रवरौ ससैन्यौ युधिष्ठिरं जग्मतुराजमीढम् ॥ १८ ॥ इसी समय वृष्णिवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामने सुना कि महाराज युधिष्ठिर प्रभासक्षेत्रमें उग्र तपस्या कर रहे हैं; तब वे अपने सैनिकोंसहित अजमीढकुलभूषण युधिष्ठिरसे मिलनेके लिये गये ॥ १८ ॥ ते वृष्णयः पाण्डुसुतान् समीक्ष्य भूमौ शयानान् मलदिग्धगात्रान् । अनर्हतीं द्रौपदीं चापि दृष्ट्वा सुदुःखिताश्चक्रुरार्तनादम् ॥ १९ ॥ वहाँ जाकर वृष्णिवंशियोंने देखा, पाण्डवलोग पृथ्वीपर सो रहे हैं, उनके सारे अंग धूलसे सने हुए हैं तथा कष्टसहनके अयोग्य द्रौपदी भी भारी दुर्दशा भोग रही है। यह सब देखकर वे बड़े दुःखी हुए और आर्त स्वरसे रोने लगे ॥ १९ ॥ ततः स रामं च जनार्दनं च कार्ष्णिं च साम्बं च शिनेश्च पौत्रम् ।